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फ्लैग - पूरे बुंदेलखंड में कांधे वाली कालीजी के नाम से प्रसिद्ध है मोहन नगर वार्ड में स्थापित माता, दशहरा पर 101 मशाल के साथ होता है विसर्जन

हेडिंग -देवीजी की अष्टभुजाओं की प्रतिमा 39 वर्षों से बना रहे स्वयं, 9 दिन में 9 रूपों के होते हैं दर्शन

- कालीजी भैयाजी वैद्य के नाम से भी हैं प्रसिद्ध, 110 वर्षों से हो रही है स्थापना।

- पंडित आलोक मेहता देवीजी की अष्टभुजाधारी मूर्ति का घर पर ही करते हैं निर्माण।

सागर। नवदुनिया प्रतिनिधि

बड़ा बाजार क्षेत्र के मोहन नगर वार्ड में स्थापित की जाने वाली कालीजी भैयाजी वैद्य देवी मां की प्रतिमा पिछले 39 वर्षों से पंडित आलोक मेहता घर पर ही स्वयं तैयार करते हैं। देवीजी की अष्टभुजाओं की प्रतिमा निर्माण करने की तैयारी नवरात्रों के करीब एक माह पहले से शुरू कर दी जाती है। नवरात्रों में 9 दिन अलग-अलग देवी मां के 9 रुपों के दर्शन होते हैं। इसके लिए उनका विशेष श्रृंगार किया जाता है। रात में शयन आरती के बाद ही देवी मां का श्रृंगार शुरू हो जाता है और अगले दिन सुबह होने वाली मंगला आरती तक देवी मां एक नए रूप में दर्शन देती है। बड़ा बाजार क्षेत्र में सबसे पहले मोहन नगर वार्ड में ही नवरात्रों में देवी जी विराजमान की गई थी। देवी मां की यह स्थापना बड़ा बाजार की पहली सबसे प्राचीन और शहर की तीसरी सबसे प्राचीन है। 1909 से यहां देवीजी की स्थापना हर वर्ष की जा रही है।

कांधे वाली काली के नाम से भी है प्रसिद्ध

मोहन नगर वार्ड में रखी जाने वाली कालीजी भैयाजी वैद्य पूरे बुंदेलखंड में कांधे वाली कालीजी के नाम से भी प्रसिद्ध है। क्योंकि यह देवी जी पालकी में विराजमान होती है और 9 दिन उपासना के बाद हजारों लोग पालकी को अपने कंधों पर उठाकर देवी मां को विसर्जन के लिए ले जाते हैं। शताब्दी वर्ष के बाद से अष्टभुजा देवीजी की प्रतिमा पर दशहरा के दिन सुबह 5 से 9 बजे तक होते हैं। कांधे वाली देवीजी के दर्शन के लिए आसपास के क्षेत्रों से सैकड़ों लोग यहां आते हैं। जो दिन में होने वाली 5 आरतियों में से किसी भी एक आरती का हिस्सा जरूर बनते हैं। सुबह मंगला आरती से लेकर रात में शयन आरती तक प्रतिदिन देवी मां की 5 आरती होती है।

101 मशालों के साथ होता है विसर्जन

नवरात्र के 9 दिन देवी मां की सच्चे मन से उपासना के बाद भक्त दशहरा के दिन 101 मशालों के साथ देवी मां को विसर्जन के लिए ले जाते हैं। दशहरा के दिन मां दुर्गा जी की पालकी के आगे बैलगाड़ी के चकों पर एक बड़ी मशाल और इसके पीछे 100 छोटी-छोटी मशालें लेकर भक्त चलते हैं। इन मशालों के पीछे कांधे पर देवी जी की पालकी को उठाकर हजारों भक्त दौड़ते हुए देवी जी को विसर्जन के लिए ले जाते हैं। दशहरा के दिन कांधे वाली देवी मां का विसर्जन देखने के लिए आसपास के ग्रामीणों क्षेत्रों से भी हजारों लोग सागर आते हैं।

इन्होंने संभाला स्थापना का दायित्व

कालीजी भैयाजी वैद्य की स्थापना 1909 में सर्वप्रथम हुई थी। डॉ. विवेक मेहता ने बताया कि स्वर्गीय दुर्गा प्रसाद मेहता जो पूरे क्षेत्र में वैद्य के नाम से प्रसिद्ध थे। उनके अस्वस्थ होने पर लाइजी मेहता ने मां जगदम्बे की स्थापना की थी। इसके बाद स्व. राजाराम वैद्य व उनके पुत्र कृष्णदत्त मेहता, फिर इनके 5 पुत्र मोतीलाल मेहता, स्व. घनश्याम मेहता, गजानन मेहता, यज्ञेश मेहता, गिरीराज मेहता ने देवी मां की स्थापना का दायित्व संभाला।

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फोटो 1210 एसए 50 - सागर। बड़ा बाजार के मोहन नगर वार्ड में विराजमान अष्टभुजाओं वाली देवी मां की प्रतिमा।

फोटो 1210 एसए 51 - सागर। देवी मां की प्रतिमा पिछले 39 वर्षों से पंडित आलोक मेहता घर पर स्वयं ही तैयार करते हैं।

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