सागर, नवदुनिया प्रतिनिधि। कच्चे ऊबड़-खाबड़ झाड़ियों के बीच से घुमावदार रतीले रास्ते, चारों ओर घना जंगल, सामने दिखती हजारों फीट ऊंची पहाड़ी, पहाड़ी के नीचे से ऊपर तक चट्टानों को काट कर बनाई गई ऊंची-नीची अव्यवस्थित सीढ़ीयां। इन पर चढ़ते हुए विभिन्न आकृतियों में कटी हुई चट्टानें और उन पर बने जंगली जानवरों के चित्र। करीब 100 सीढ़ियां चढ़ने और कुछ देर पैदल चलने के बाद लोग मां विंध्यवासिनी के दरबार में पहुंचते है।

चारों ओर फैला घना जंगल, गहरी शांति और हरियाली की चादर ओढ़े प्रकृति के बीच यह स्थान शहर से महज 50 किलोमीटर दूर दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित है, लेकिन पर्यटन विभाग व जिला प्रशासन की उपेक्षा की वजह से इसके बारे में शहर के कम ही लोगों को जानकारी है।

पहाड़ी पर 2 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित यह स्थान अत्यंत प्राचीन है। यहां मंदिर के पास हनुमानजी की 30 से 35 फीट गहरी गुफा, शिलालेख, चट्टानों पर उखेरा गया देश का नक्शा और अशोक स्तम्भ भी मौजूद है। इसके साथ ही डॉ. हरीसिंह गौर के दान की कहानी भी यहां के शिलालेखों पर पढ़ने मिलेगी।

मार्कण्डेय गुफा में विराजमान हैं हनुमानजी

पहाड़ी पर चढ़ने के बाद विंध्यावासिनी देवी के मंदिर से करीब 40 फीट की दूरी पर चट्टानों के बीच से एक गहरी और सकरी गुफा नीचे की ओर गई है, जिसे मार्कण्डेय गुफा के नाम से जाना जाता है। करीब 30 से 35 फीट गहरी इस गुफा में नीचे हनुमान जी विराजमान है। यहां के लोगों का कहना है कि बहुत कम लोग ही इस गुफा में नीचे तक जा पाते हैं। गुफा में नीचे घना अंधेरा और सकरी होने की वजह से ऑक्सीजन की मात्रा कम होने से दम भी घुटने लगता है। अधिकांश लोग गुफा के बाहर से ही वापस लौट आते हैं।

यह है जाने का रास्ता

-सागर से ढाना होते हुए बरोदा गांव तक पहुंचना है।

-वहां से बंसिया होते हुए नारायणपुर तक पक्का रास्ता है।

-नारायणपुर से पहा़ड़ी क्षेत्र शुरू होता है, जो कच्चे रास्तों से होते हुए गौरीदंत के नीचे पहाड़ी तक पहुंचाता है।

-यहां से करीब 100 सीढ़ियां चढ़कर मंदिर तक लोग पहुंच जाते हैं।