रन्नौद। नईदुनिया न्यूज

अकाझिरी गांव में बाग वाले हनुमान मंदिर रामलीला मैदान में चल रही श्रीमद् भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के रविवार को द्वितीय दिवस पर ध्रुव के प्रसंग की कथा सुनाई, जिसे सुनकर श्रोता भाव विभोर हो गए। भागवताचार्य ने बताया कि अयोध्या नरेश राजा उत्तानपाद के कोई संतान न होने के कारण रानी सुनीति के बहुत आग्रह करने के बाद अयोध्या नरेश राजा उत्तानपाद ने दूसरा विवाह रानी सुरुचि के साथ किया। सुरुचि नें राजमहल में कदम रखते ही अपनी मर्जी के मुताबिक, राज चलाना प्रारंभ कर दिया। उसने राजा उत्तानपाद से साफ शब्दों में कह दिया कि बड़ी रानी को महल से बाहर निकलवाने का आदेश और भोजन में सब्जी और रोटी एक साथ न देनें का आदेश जारी करवा दिया, लेकिन बड़ी रानी सुनीति पतिव्रता नारी थी, उसने यह सब सहते हुए पतिव्रत धर्म का पालन किया। धीरे-धीरे समय बीतता गया, लेकिन विधि के विधान को कौन जान सकता है। बड़ी रानी सुनीति के वह दिन आ गया, जिस दिन का उन्हें बेसब्री से इंतजार था। नवमास परिपूर्ण होने पर बहुत सुंदर पुत्र को जन्म दिया। इधर छोटी रानी सुरुचि भी गर्भ धारण करके एक पुत्र को जन्म दिया। ब्राह्मण द्वारा नामकरण संस्कार कराया गया। बड़ी रानी सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव और छोटी रानी सुरुचि के पुत्र का नाम उत्तम रखा गया। धीरे धीरे दोनों पुत्र बड़े होने लगे। एक दिन की बात है, जब अयोध्या नरेश महाराज उत्तानपाद अपने दरबार में छोटी रानी सुरुचि के पुत्र उत्तम को गोदी में लिए हुए बैठे थे। तभी अचानक बड़ी रानी सुनीति का पुत्र ध्रुव भी कहीं से खेलता हुआ दरबार आ गया तो महाराज नें उसे भी उठाकर अपनी गोद में बिठा लिया और प्यार करने लगे, तभी अचानक छोटी रानी ने ध्रुव को महाराज की गोद में बैठा देखकर आग बबूला हो गई और तुरंत ही ध्रुव की बांह पकड़कर महाराज की गोदी से नीचे उतार दिया और कहा अगर बैठना ही है तो जा अपने पिता की गोद में बैठो। वह छोटा सा बालक ध्रुव रोता हुआ वहां से चल दिया और अपनी मां के पास गया। मां ने रोने का कारण पूछा तो पूरी कहानी रो-रो कर अपनी मां को बताई और बालक ध्रुव ने अपने पिता के बारे में पूछा तो आज मैया सुनीति कहने लगी, बेटा ध्रुव तुम्हारे पिता विष्णु जी हैं और जाओ उन्हीं की गोद में बैठो। पांच वर्ष का छोटा बालक ध्रुव भगवान विष्णु से मिलने को वन को चल पड़ा, लेकिन धन्य है, मैया सुनीति, जिन्होंने ध्रुव से कहा, वन को जाने से पूर्व महाराज और छोटी रानी सुरुचि को प्रणाम करके ही वन जाना। ध्रुव महाराज और छोटी रानी को प्रणाम कर वन को चल दिए। रास्ते में नारद जी का मिलन होता है। पहले तो नारद जी नें घर वापस भेजने के बहुत प्रयत्न किए, लेकिन सफल नहीं हुए। अंत में एक मंत्र दिया और कहा, इसका जाप करना, भगवान हरि अवश्य मिलेंगे। छोटी सी उम्र का बालक ध्रुव आज तपस्या में लीन हो गया और नारद द्वारा बताए गए मंत्र का जाप करने लगा और फिर भगवान विष्णु बालक का दृढ़ निश्चय देखकर प्रकट हुए और कहा, बेटे ध्रुव! मैं तुम्हारी तपस्या से बहुत प्रसन्न हूं ,वरदान मांगो। बालक ध्रुव कहने लगा कि हे प्रभु मुझे तो आपकी गोद में बैठना है। भगवान विष्णु ने जिस समय बालक ध्रुव को गोद में बिठाया है। इसलिए भक्ति करने के लिए वृद्घावस्था का इंतजार नहीं करना चाहिए। हमें सदैव भगवान की भक्ति करना चाहिए।

17 कैप्शन : कथा का वाचन करते हुए कथा वाचक महाराज।