राजेश वर्मा, उज्जैन। महाराष्ट्र में अष्ट विनायक की तरह धर्म नगरी उज्जयिनी में षड् विनायक की मान्यता है। स्कंदपुराण के अनुसार वनवास के दौरान जब प्रभु श्रीराम माता सीता व भाई लक्ष्मण के साथ अवंतिकापुरी में आए, तब माता सीता ने षड् विनायक की स्थापना की थी। जनश्रुति में प्रत्येक गणपति की अपनी विशेष कथा है। षड् विनायक में दुर्मुख गणेश जिन्हें कालांतर में चोर गणेश के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है कि चोर जब चोरी करने जाते हैं तो चोर गणेश को भेंट चढ़ाते हैं तथा मन्नत पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।

दुर्मुख विनायक (चोर गणेश)

अंकपात मार्ग के प्रमुख चौराहा खाकचौक से रामजनार्दन मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर चोर गणेश का मंदिर है। प्राचीन काल में इन्हें दुर्मुख विनायक कहा जाता था। सालों पहले मंदिर के आसपास भयानक झाड़ियां थीं, जिनमें चोर छुपे रहते थे। रात्रि में जब चोर चोरी के लिए निकलते, तो चोर गणेश को भेंट आदि चढ़ाकर चोरी में सफलता के लिए मन्नत मांगते थे। कहा जाता है कि अभी-भी चोर भगवान का अशीर्वाद लेते हैं।

मोदक प्रिय विनायक (लड्डू गणेश )

शक्तिपीठ हरसिद्घि के पीछे रामघाट मार्ग स्थित योगीपुरा में अच्युतानंद गुरु अखाड़ा के बाहर मोदक प्रिय विनायक का छोटा सा मंदिर है। इन्हें लड्डू गणेश के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है सुबह उठने के बाद सबसे पहले लड्डू गणेश के दर्शन करने से भक्त को दिन में अवश्य लड्डू खाने को मिलते हैं। ज्योतिर्विद पं.आनंदशंकर व्यास के अनुसार उनका परिवार वर्षों से भगवान के इस चमत्कार का अनुभव करता आया है।

चिंतामन गणेश

ग्राम चिंतामण में प्रसिद्घ चिंतामन गणेश का विशाल मंदिर है। इस मंदिर में चिंतामन गणेश, इच्छामन गणेश तथा सिद्घि विनायक गणेश की संयुक्त मूर्ति विराजित है। मान्यता है भगवान चिंतामन गणेश के दर्शन से भक्त की मानोकामना पूर्ण होती है। मांगलिक सिद्घ होते हैं तथा सुख समृद्घि की प्राप्ति होती है। चैत्र मास में प्रतिवर्ष यहां मेला लगता है। मंदिर परिसर में पुराण प्रसिद्घ लक्ष्मण बावड़ी भी स्थित है।

यहां स्थित है षड् विनायकों के शेष तीन मंदिर

षड् विनायकों के शेष तीन मंदिरों में महाकाल मंदिर में कोटितीर्थ कुंड के समीप लक्ष्मी प्रदाता गणेश, कढ़कालिका माता मंदिर के समीप स्थिरमन गणेश तथा मंगलनाथ मार्ग पर खाकचौक से पहले श्री पंच रामानंदीय खाकी अखाड़े के बाहर अविघ्न विनायक का मंदिर स्थित है।

भद्रपद मास में होती है यात्रा

भद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से चतुर्दशी तक दस दिन षड् विनायक की यात्रा का विधान है। भक्त सफलता, सिद्घि तथा मानोवांछित फल की प्राप्ति के लिए षड् विनायक के दर्शन करते हैं।