भोपाल। बुंदेली भारत के एक बड़े भाग की समृद्ध लोक भाषा रही है। लेकिन, हिंदी सारे देश की भाषा के रूप में विकसित और व्यवस्थित हुई है। यह बात डॉ. गंगा प्रसाद गुप्त बरसैंया ने कही। वे हिंदी दिवस पर मायाराम सुरजन भवन में रविवार को आयोजित विमर्श को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। मप्र हिंदी साहित्य सम्मेलन और अखिल भारतीय बुंदेलखंड परिषद के इस कार्यक्रम में 'हिंदी और लोक भाषाएं' विषय पर उन्होंने कहा कि ऐसी स्थित में बुंदेली जैसी लोक भाषाओं को भी हिंदी की समृद्धि से जुड़ना चाहिए। साथ ही किसी प्रकार की प्रतिस्पर्धा का भाव भी नहीं होना चाहिए। इस विमर्श के दौरान विशिष्ट अतिथि के रूप में इतिहासविद डॉ. शंभु दयाल गुरु ने कहा कि बुंदेली केवल बोली ही नहीं प्रमाणिक भाषा भी है। 16वीं-17वीं शताब्दी में बुंदेली अंतरराज्यीय भाषा भी रही है। उस समय बुन्दलखंड क्षेत्र के विभिन्न राज्यों की ओर से दूसरे राज्यों को भेजे जाने वाले शासकीय पत्र बुंदेली में ही होते थे। वरिष्ठ साहित्यकार कैलाश मड़बैया ने कहा कि हिंदी का जन्म संस्कृत और भारत की लोक भाषाओं से ही हुआ है। ऐसे में हिंदी की जड़ें भारत की इन लोक भाषाओं में ही निहित हैं। हमें हिंदी को समृद्ध करने के लिए लोक भाषाओं रूपी जड़ो के बारे में भी सोचना होगा।

कविताओं में व्यक्त की भावनाएं

इस अवसर पर आयोजित काव्य गोष्ठी में रचनाकारों ने अपनी भावनाओं को कविताओं में पिरोकर प्रस्तुत किया। गोष्ठी में वरिष्ठ कवि डॉ. हुकुम पाल सिंह विकल ने पढ़ा 'आचमन से सिंधु तक पीता रहा आदमी, गीत ही क्या स्वयं में गीता रहा है आदमी..।' इसके बाद डॉ. गौरीशंकर गौरीश ने अपनी रचना के माध्यम से हिंदी भाषा की गाथा सुनाई। उन्होंने पढ़ा, 'बहु भाषा बहु संस्कृति भारत की पहचान बुंदेली अवधी के संग जीता हिंदुस्तान..।' लता स्वरांजली ने ' रंग भी सौंपकर खुशबुएं सौंपकर..' रचना पेश की। इसके बाद मोहन सिंह ठाकुर ने 'उस तरफ देख लो महलों की बुलंदी लोगों मुफलिसी दौर यहां अपने आशियाने में..' शेर पेश कर वाहवाही पाई। गोष्ठी के दौरान प्र्रेम सक्सेना, राजेंद्र शर्मा अक्षर, सुबोध कुमार श्रीवास्तव, ओम भारती, मांगीलाल जैन, रूपराज शर्मा सहित अन्य कवि और साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।