डॉ मीनू वालिया। जिन महिलाओं ने कभी सिगरेट को हाथ भी नहीं लगाया वे भी फेफड़े के कैंसर की शिकार हो रही हैं और इसका मुख्य कारण है घरों में पनपनेवाला प्रदूषण। पैसिव स्मोकिंग के साथ-साथ उन्हें कच्चे चूल्हे से निकलने वाले धुएं का लगातार सामना करने के कारण भी फेफड़ों का कैंसर हो जाता है।

हाल ही में हमारे देश में हुए शोध अध्ययनों से पता चला है कि फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित सभी महिलाओं में से 80 प्रतिशत महिलाएं धूम्रपान नहीं करती हैं। ग्लोबोकॉन 2018 में पेश किए गए आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं। महिलाओं में फेफड़ों का कैंसर होने का मुख्य कारण रसोईघर का हवादार नहीं होना और घरेलू वायु प्रदूषण है।

लंग कैंसर के रिस्क फैक्टर्स

किसी भी तरह का धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर के लिए जिम्मेदार माना जाता है। इसमें बीड़ी, सिगरेट और हुक्के के अलावा कंडे या लकड़ी के चूल्हे से निकलने वाला धुआं शामिल है। घर के किसी सदस्य द्वारा नियमित रूप से धूम्रपान करना और उसी घर में महिलाओं का लंबे समय तक निकलने वाले बीड़ी अथवा सिगरेट के धुएं के संपर्क में रहने की स्थिति को पैसिव स्मोकिंग कहते हैं। महिलाओं और बच्चों को न चाहते हुए भी धूम्रपान के धुएं में सांस लेना पड़ती है।

एअर पॉल्युशन की भूमिका

वायुमंडल के प्रदूषण को भी फेफड़ों के कैंसर केलिए एक बड़ा जोखिम माना जाता है। जो लोग दूषित वायु के संपर्क में रहते हैं जैसे चौराहों पर ड्‌यूटी देने वाले ट्रेफिक के सिपाही और स्लेट पैंसिल के कारखानों में काम करने वाले मजदूरों को फेफड़ों के कैंसर का खतरा हमेशा बना रहता है। दिल्ली के एक अस्पताल द्वारा हाल ही में कराए गए एक शोध अध्ययन में पाया गया कि धूम्रपान नहीं करने वाली सभी महिलाएं धूम्रपान करने वाले पुरुषों और महिलाओं से अधिक प्रभावित हुईं। दो साल तक किए गए इस अध्ययन में फेफड़ों के कैंसर के 250 से अधिक रोगियों को शामिल किया गया था। इसमें यह देखा गया कि सिर्फ धूम्रपान ही फेफड़ों के कैंसर का कारण नहीं है। धूम्रपान नहीं करने वाली महिलाओं में बीमारी की दर काफी अधिक थी। इस अध्ययन में शामिल कुल रोगियों में से 75 प्रतिशत पुरुष थे और शेष एक-चौथाई महिलाएं थीं। महिलाओं से संबंधित आंकड़े बेहद चौंकाने वाले और विपरीत थे।

पुरुष और महिलाएं दोनों इन कारकों से प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन जागरूकता की कमी महिलाओं के लिए अधिक खतरनाक है क्योंकि महिलाओं में फेफड़े के कैंसर का पता देर से चलता है और महिलाएं डॉक्टर केयहां जाने से हिचकती हैं। इसलिए महिलाओं के लिए इस बीमारी के प्रति जागरूक होना और ऐसी बीमारियों के कारणों के बारे में जानना जरूरी है।

फिल्टर वाली सिगरेट या बीड़ी निरापद नहीं

वशेषज्ञों का मानना है कि बीते 30 सालों में फेफड़ों के कैंसर का स्वरूप काफी बदल गया है। अब इन दिनों स्क्वामस सेल कैंसर की बजाय एडिनोकार्सिनोमा के केसेस ज्यादा सामने आ रहे हैं। इसके लिए सिगरेट में फिल्टर के इस्तेमाल को भी जिम्मेदार माना जा रहा है। सोचा यह था कि फिल्टर सिगरेट का प्रयोग निरापद साबित होगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फेफड़ों के कैंसर के रोगियों की संख्या में पहले की तुलना में इजाफा ही हुआ है।