अपनी बात, निर्मला भुराडि़या

दुनिया के फिल्म जगत में हिन्दी फिल्में एक अलग ही स्थान रखती हैं, एक विशिष्ट श्रेणी मानी जाती हैं। अपने आप में अनूठी। इनमें फॉर्मूले भी होते हैं, मसाले भी होते हैं और नाच-गाने भी। कहानी में गुंथे गीतों की वजह से मुंबईया फिल्मों ने अपनी अलग ही पहचान बनाई है। हम भारतीयों के मिजाज के अनुकूल ही हमारी फिल्में भावनाओं के रस से लबालब होती हैं। इतनी कि कभी-कभी ये भावनाएं चाशनी की तरह रिसती महसूस होती हैं।

सिर्फ प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी ही नहीं मां, बहन, पिता, पुत्र, पुत्री, भाई आदि का प्यार भी हमारी फिल्मी संवेदना का खास हिस्सा हैं। हमें अपनेपन में भीगने, सुबकने या साथ में रुमाल लेकर फिल्म जाने में कोई आपत्ति नहीं होती। वह यूं कि रिश्तों की अभिव्यक्ति को लेकर ठंडी-संस्कृति हमारी है भी नहीं। अपने अपनों से हम संयमित औपचारिकता से पेश नहीं आते, यही बात हमारी फिल्मों में भी झलकती है।

यही नहीं गीतों में भी हमारे यहां सिर्फ प्रणय-गीत और दुख-सुख के दार्शनिक नगमे ही नहीं हैं। पिता, मां, बहन, दोस्त आदि को लेकर भी बेहद भावपूर्ण दृश्य, संवाद व गीत हमारी फिल्मों में होते हैं। मां पर जितने गीत हिन्दी फिल्मों में आए हैं वो शायद ही कहीं आए होंगे। और हर गीत ऐसा कि भावना के वशीभूत होकर रोएं खड़े हो जाएं या आंख से अश्रुपात होने लगे। फिल्म 'दादी मां" का यह गीत, 'उसको नहीं देखा हमने कभी पर उसकी जरूरत क्या होगी, ऐ मां तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी?"

मां को ईश्वर के सिंहासन पर बैठाने वाला यह गीत इतना सरल-तरल है कि यह महिमामंडन नहीं लगता। सच ही लगता है और संगीत की लय में बजती बग्घी के घोड़े की टापों के स्वर में आप भी बह जाते हैं। ऐसा ही एक गीत है 'राजा और रंक" का, 'तू कितनी अच्छी है, तू कितनी भोली है प्यारी-प्यारी है, ओ मांऽऽ-ओ मां ऽऽ"। इस गीत का अंतरा तो बहुत ही तगड़ा कवित्त है जो मां को काफी हद तक परिभाषित करने की कोशिश करता है, 'अपना नहीं तुझे सुख-दुख कोई, मैं मुस्काया, तू मुस्काई, मेरे हंसने पर, मेरे रोने पर तू बलिहारी है, ओ मांऽऽ।"

सच में मां ऐसी ही होती है पुत्र या पुत्री को कांटा चुभे तो खून उसे निकलता है। अपने पुत्र या पुत्री के दर्द को वो महसूस कर लेती है। गर्भ से बाहर आने पर भी वह उसके ही शरीर का हिस्सा रहते हैं और आजन्म अदृश्य गर्भनाल से उससे जुड़े रहते हैं। एक और गीत है, 'मां मुझे अपने आंचल में छुपा ले, गले से लगा लो..." सच मां का स्पर्श तो स्वयं में एक निदान है। कहें कि यह दुनिया की सबसे बड़ी दवा है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

इसी तरह सचिन देव बर्मन की आवाज में एक बहुत ही सुंदर गीत है, 'मेरी दुनिया है मां तेरी आंचल में।" आंचल से यहां तात्पर्य ममता की वर्चुअल छांव है, साड़ी का टुकडा नहीं। मां जीन्स पहनती है तब भी यह आंचल तो फहराता ही रहता है। नजदीक के अतीत में फिल्म 'तारे जमीं पर" का एक बहुत ही सुंदर गीत है, जो प्रसून जोशी द्वारा लिखा गया है, 'तुझे सब है पता मेरी मां"। इस फिल्म में एक ऐसा बालक है, जिसका मन समझने वाला कोई नहीं, मगर उसे पता है कि मां सब समझती है कि उसके भय क्या है, उसकी चिंताएं क्या हैं, उसकी खुशियां क्या हैं।

कहते हैं इंसान जब स्वयं मां या पिता बनता है तब जाकर उसे अपनी मां या पिता के होने का अर्थ समझ आता है। उनकी ममता का मोल, उनके त्याग की कीमत, उनके स्नेह-वात्सल्य की परतें एक-एक कर खुलकर अपने भेद समझाने लगती है। मगर अफसोस कुछ संवेदनहीन लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें अपने मां-बाप के जज्बात कभी समझ नहीं आते। समझना तो दूर वे उनसे संवेदनहीन व्यवहार करके ममता का मोल चुकाते हैं!

ये बात और है कि ममता तो उन्हें फिर भी माफ कर देती है। मां तो मां ही रहती है आप जहर भी डाल दें तो उसका रसायन नहीं बदलता वह तो हमेशा ममता के अमृत से ही आप्लावित रहती है। चलते-चलते यह गीत भी शेयर कर लें जो मां का मोल समझाता है, 'कौन-सी है वो चीज जो यहां नहीं मिलती, सब कुछ मिल जाता है, लेकिन मां नहीं मिलती।" यह सच है कि मां अमूल्य है और यह भी कि 'वो होते हैं किस्मत वालेल जिनके मां होती है।"