डॉ. अमरनाथ

ज्ञान के सबसे बड़े सर्च इंजन विकीपीडिया ने नए सर्वेक्षण में दुनिया की सौ भाषाओं की सूची जारी की और उसमें हिंदी को चौथा स्थान दिया। अब तक हिंदी को दूसरे स्थान पर रखा जाता था। पहले स्थान पर चीनी थी। यह परिवर्तन इसलिए हुआ की सौ भाषाओं की इस सूची में भोजपुरी, अवधी, मैथिली, मगही, हरियाणवी और छत्तीसगढ़ी को स्वतंत्र भाषा का दर्जा मिला। हिंदी को खण्ड-खण्ड करके देखने की यह अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति है।

आज भी यदि हम इनके सामने अंकित संख्याओं को हिंदी बोलने वालों की संख्या में जोड़ दें तो हिंदी फिर दूसरे स्थान पर पहुंच जाएगी। किन्तु यदि उक्त भाषाओं के अलावा राजस्थानी, ब्रजी, कुमायूंनी-गढ़वाली, अंगिका, बुंदेली जैसी बोलियों को भी स्वतंत्र भाषाओं के रूप में गिन लें, तो निश्चित रूप से हिंदी सातवें-आठवें स्थान पर पहुंच जाएगी और जिस तरह से हिंदी की उक्त बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग जोरों से की जा रही है यह घटना यथार्थ बन जाएगी।

हमारे पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने 17 मई 2012 को लोकसभा के सांसदों को आश्वासन दिया था कि आगामी मानसून सत्र में भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने वाला बिल पेश होगा। यदि वह सत्र कोयला घोटाले की भेट न चढ़ता तो हिंदी के खूबसूरत घर का एक हिस्सा और बंट गया होता।

अब भी यदि समय रहते हमने इस बिल के पीछे छिपी साम्राज्यवाद और उसके दलालों की साजिश का पर्दाफाश नहीं किया तो हमें डर है कि नई सरकार भी बहुत जल्दी संसद में यह बिल लाएगी और बिना किसी बहस के कुछ मिनटों में ही बिल पारित भी हो जाएगा क्योंकि अब तो मनोज तिवारी जैसे भोजपुरी के कलाकार सांसद भी हैं। टुकड़े-टुकडे होकर बिखरना हिंदी भाषियों की नियति बन चुकी है। ग्लोबल विलेज जैसी विचारधारा के नाम पर हमारी भाषाओं और जातीयताओं को टुकड़ों-टुकड़ों में बांट कर कमजोर किया जा रहा है।

भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग समय-समय पर संसद में होती रही है। प्रभुनाथ सिंह, रघुवंश प्रसाद सिंह, संजय निरूपम, अली अनवर अंसारी, योगी आदित्यनाथ जैसे सांसदों ने समय-समय पर यह मुद्दा उठाया है। बहरहाल, मामला सिर्फ भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता देने का नहीं है।

मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद छत्तीसगढ़ ने 28 नवंबर 2007 को अपने राज्य की राजभाषा छत्तीसगढ़ी घोषित की और विधान सभा में प्रस्ताव पारित करके उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की। यही स्थिति राजस्थानी की भी है। हकीकत यह है कि जिस राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग जोरों से की जा रही है उस नाम की कोई भाषा वजूद में है ही नहीं।

राजस्थान की 74 में से सिर्फ 9 (ब्रजी, हाड़ौती, बागड़ी, ढूंढाड़ी, मेवाड़ी, मेवाती, मारवाड़ी, मालवी, शेखावटी) बोलियों को राजस्थानी नाम देकर संवैधानिक दर्जा देने की मांग की जा रही है। बाकी बोलियों पर चुप्पी क्यों? इसी तरह छत्तीसगढ़ में 94 बोलियां हैं जिनमें सरगुजिया और हालवी जैसी समृद्ध बोलियां भी हैं। छत्तीसगढ़ी को संवैधानिक दर्जा दिलाने की लड़ाई लड़ने वालों को इन छोटी-छोटी उप बोलियां बोलने वालों के अधिकारों की चिन्ता क्यों नहीं है?

पिछली सरकार के केंद्रीय गृहराज्य मंत्री नवीन जिंदल ने लोकसभा में एक चर्चा को दौरान कुमांऊनी-गढ़वाली को संवैधानिक दर्जा देने का आश्वासन दिया था। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि यदि हरियाणा सरकार हरियाणवी के लिए कोई संस्तुति भेजती है तो उस पर भी विचार किया जाएगा।

मैथिली तो पहले ही शामिल हो चुकी है। फिर अवधी और ब्रजी ने कौन सा अपराध किया है कि उन्हें आठवीं अनुसूची में जगह न दी जाए जबकि उनके पास रामचरितमानस और पद्मावत जैसे ग्रंथ हैं? हिंदी साहित्य के इतिहास का पूरा मध्य काल तो ब्रज भाषा में ही लिखा गया। इसी के भीतर वह कालखण्ड भी है जिसे हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग (भक्तिकाल) कहते हैं।

संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हिन्दुस्तान की कौन सी भाषा है जिसमें बोलियां नहीं हैं? गुजराती में सौराष्ट्री , गामड़िया, खाकी आदि, असमिया में क्षखा, मयांग आदि, ओड़िया में संभलपुरी, मुघलबंक्षी आदि, बंगला में बारिक, भटियारी, चिरमार, मल- पहाड़िया, सामरिया, सराकी, सिरिपुरिया आदि, मराठी में गवड़ी, कसारगोड़, कोस्ती, नागपुरी, कुडाली आदि। इनमें तो कहीं भी अलग होने का आन्दोलन सुनाई नहीं दे रहा है। बंगला तक में नहीं, जहां अलग देश है।

अस्मिताओं की राजनीति करने वाले कौन लोग हैं? कुछ गिने-चुने नेता, कुछ अभिनेता और कुछ स्वनामधन्य बोलियों के साहित्यकार। वे नेता जिन्हें स्थानीय जनता से वोट चाहिए। वे जो भाषा और संस्कृति के नाम पर भेद खड़े करना चाहते हैं। बोलियों को संवैधानिक मान्यता दिलाने में वे साहित्यकार सबसे आगे हैं जिन्हें हिंदी जैसी समृद्ध भाषा में पुरस्कृत और सम्मानित होने की उम्मीद टूट चुकी है।

हमारे कुछ मित्र तो इन्हीं के बल पर हर साल दुनिया की सैर करते हैं, करोड़ों के वारे-न्यारे करते हैं। स्मरणीय है कि नागार्जुन को साहित्य अकादमी पुरस्कार उनकी मैथिली कृति पर मिला था किसी हिंदी कृति पर नहीं। बुनियादी सवाल यह है कि आम जनता को इससे क्या लाभ होगा?

वस्तुत: साम्राज्यवाद की साजिश हिंदी की शक्ति को खण्ड-खण्ड करने की है क्योंकि बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से हिंदी, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है। इस देश में अंग्रेजी के सामने सबसे बड़ी चुनौती हिंदी ही है। इसलिए हिंदी को कमजोर करके इस देश की सांस्कृतिक अस्मिता को, इस देश की रीढ़ को आसानी से तोड़ा जा सकता है। साम्राज्यवाद की यही साजिश है।

जिस भोजपुरी, राजस्थानी या छत्तीसगढ़ी का कोई मानक रूप तक तय नहीं है, जिसके पास गद्य तक विकसित नहीं हो सका है उस भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराकर उसमें मेडिकल और इंजीनियरी की पढ़ाई की उम्मीद करने के पीछे की धूर्त मानसिकता को आसानी से समझा जा सकता है।

अगर बोलियों और उसके साहित्य को बचाने की सचमुच चिन्ता है तो उसके साहित्य को पाठ्यक्रमों में शामिल कीजिए, उनमें फिल्में बनाइए, उनका मानकीकरण कीजिए। उन्हें आठवीं अनुसूची में शामिल करके हिंदी से अलग कर देना और उसके समानान्तर खड़ा कर देना तो उसे और हिंदी, दोनों को कमजोर बनाना है और उन्हें आपस में लड़ाना है। जिसमें दोनों का ही नुकसान स्पष्ट समझा जा सकता है।

हिंदी दुर्गा की तरह है। जैसे सारे देवताओं ने अपने-अपने तेज दिए और दुर्गा बनी वैसे ही सारी बोलियों के समुच्चय का नाम हिंदी है। यदि सभी देवता अपने-अपने तेज वापस ले लें तो दुर्गा खत्म हो जाएगी, वैसे ही यदि सारी बोलियां अलग हो जाएं तो हिंदी के पास बचेगा क्या? हिंदी का अपना क्षेत्र कितना है?

वह दिल्ली और मेरठ के आस-पास बोली जाने वाली कौरवी से विकसित हुई है। हम हिंदी साहित्य के इतिहास में चंदबरदाई और मीरा को पढ़ते हैं जो राजस्थानी के हैं, सूर को पढ़ते हैं जो ब्रजी के हैं, तुलसी और जायसी को पढ़ते हैं जो अवधी के हैं, कबीर को पढ़ते हैं जो भोजपुरी के हैं और विद्यापति को पढ़ते है जो मैथिली के हैं। इन सब को हटा देने पर हिंदी साहित्य में बचेगा क्या? इस पर विचार जरूरी है।

हिंदी की सबसे बड़ी ताकत उसकी संख्या है। इस देश की आधी से अधिक आबादी हिंदी बोलती है और यह संख्या बल बोलियों के नाते है। यदि बोलियां आठवीं अनुसूची में शामिल हो गईं, तो आने वाली जनगणना में मैथिली की तरह भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी आदि को अपनी मातृभाषा बताने वाले हिंदी भाषी नहीं गिने जाएंगे। और तब हिंदी तो मातृभाषा बताने वाले गिनती के रह जाएंगे, हिंदी की संख्या बल की ताकत स्वत: खत्म हो जाएगी।

चीनी का सबसे छोटा दाना पानी में सबसे पहले घुलता है। हमारे ही किसी अनुभवी पूर्वज ने कहा है, 'अश्वं नैव गजं नैव व्याघ्रं नैव च नैव च। अजा पुत्रं बलिं दद्यात दैवो दुर्बल घातक:।" अर्थात घोड़े की बलि नहीं दी जाती, हाथी की भी बलि नहीं दी जाती और बाघ की बलि की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। बलि बकरे की ही दी जाती है। दैव भी दुर्बल का ही घातक होता है। अब तय हमें ही करना है कि हम बाघ की तरह बनकर रहना चाहते हैं या बकरे की तरह।

(लेखक अध्यक्ष 'अपनी भाषा" तथा हिंदी विभाग कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं। )