हिंदी का प्रसार करने के परंपरागत तरीके बेअसर साबित हो रहे हैं और भाषा का स्वरूप थोड़ा गड़बड़ाया है। बदलते दौर ने हिंदी के समक्ष नई चुनौतियां खड़ी की हैं। हिंदी दिवस पर हमने साहित्य और शिक्षा जगत के प्रमुख हस्ताक्षरों के जरिए जानने की कोशिश की कि आखिर किस दिशा में जा रही है हमारी हिंदी।

आसान नहीं इस भाषा को मिटाना

राजेश जोशी

हिंदी के सामने भी इस समय वे ही चुनौतियां हैं जो दूसरी भारतीय भाषाओं के सामने हैं। अंग्रेजी का प्रभुत्व बढ़ता हुआ हम देख रहे हैं। इस समय भारतीय भाषाओं को खत्म करने का एक षडयंत्र चल रहा है। अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इसे अच्छे से महसूस किया जा सकता है कि वहां हिंदी के अच्छे और बोलचाल में आने वाले शब्दों की जगह अंग्रेजी के शब्द घुसाए जा रहे हैं। अफ्रीकी देशों में इसी तरह भाषाएं खत्म हुई हैं।

अंग्रेजी ने वहां की स्थानीय भाषाओं को खत्म किया और अब वहां अंग्रेजी ही प्रमुख भाषा है लेकिन हिन्दुस्तान में शायद ऐसा करना संभव न हो पाए क्योंकि यहां बहुत बड़ी संख्या में जनता हिंदी बोलती और बरतती है। बाजार को हिंदीभाषी जनता तक पहुंचना है तो वह हिंदी को बढ़ावा दे रहा है। पहले जहां इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की जानकारी सिर्फ अंग्रेजी में आती थी तो अब हिंदी में भी उपलब्ध रहती हैं।

कई सॉफ्टवेयर हिंदी के लिए बन रहे हैं। हिंदुस्तान में बाजार भी हिंदी को नजरअंदाज नहीं कर सकता है। फिर यह भी देखना चाहिए कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में अंग्रेजी को जानने वाले केवल दो प्रतिशत लोग हैं। पिछले दिनों गांवों के स्कूलों में जो सर्वे हुए उनसे सामने आया कि गांवों में अध्यापकों को भी अंग्रेजी के साधारण शब्दों की स्पेलिंग तक नहीं पता है। ऐसी अंग्रेजी तो अंग्रेजी को ही खत्म करने का काम करेगी।

मोबाइल पर जो नई तरह की भाषा चल रही है जिसमें अंग्रेजी के शब्द 'योर' के लिए 'यू' और 'आर' लिखा जाता है, तो ऐसे भाषा किस तरह बचेगी? हम कह सकते हैं कि हिंदी का नहीं बल्कि खुद अंग्रेजी का ही भविष्य खतरे में है।

(लेखक साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त वरिष्ठ कवि हैं)

यह मनोरंजन की भाषा है गंभीर कार्यवाही की नहीं

मृदुला गर्ग

हिंदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि बड़ा युवा वर्ग अंग्रेजी की तरफ जा रहा है। क्योंकि अंग्रेजी में रोजगार के अवसर हैं तो वही इस समय की भाषा बन गई है। हमें इस तरफ ध्यान देना चाहिए कि हिंदी में साहित्य के अलावा अन्य विषयों की पर्याप्त सामग्री हो ताकि वह रोजगार की भाषा बन सके। तकनीक की दुनिया में भी हिंदी में पिछड़ापन है। यूनीकोड के जरिए एक कोड हुआ लेकिन फिर भी हिंदी में बहुत से अन्य फॉण्ट हैं जिनमें रूपांतरण करते ही शब्द बदल जाते हैं। अंग्रेजी के साथ ऐसा नहीं होता। तो जब कोई भाषा तकनीक में पिछड़ती है तो वह लगातार पिछड़ती चली जाती है। और अगर विकल्प उपलब्ध नहीं है तो फिर लोग अंग्रेजी का सहारा लेते हैं।

यह एक मकडजाल है जिससे बाहर आने का रास्ता नहीं है। हम हिंदी से भावात्मक स्तर पर जुड़े हो सकते हैं लेकिन अगर कोई भाषा कमाई का साधन नहीं बन पा रही है तो वह दुनिया की सुंदर भाषा होने के बावजूद व्यापक भाषा नहीं हो पाती है। कभी अंग्रेजी फ्रेंच और जर्मन से भी पिछड़ी थी लेकिन अमेरिका के कारण वह दुनियाभर में चली गई। हिंदी इस समय फिल्मों, धारावाहिकों व गानों और इस तरह मनोरंजन की भाषा तो है लेकिन गंभीर कार्यवाही की नहीं।

भारतीय परिवारों में माता-पिता बच्चों से खिचड़ी हिंदी में बात करते हैं और बच्चे भी वैसी ही हिंदी सीखते हैं। भाषा को भ्रष्ट करने के संस्कार तो उन्हें यहीं से मिल रहे हैं। जितने भी सूचना पट्ट हमें दिखलाई पड़ते हैं उनके हिज्जे ठीक नहीं होते। एक बैंक में मैंने देखा लिखा था- 'यहां क्षण मिलता है।' इस पर किसी का ध्यान नहीं गया कि उन्होंने 'ऋण' की जगह 'क्षण' लिख दिया और किसी ने उसे सुधारने की जहमत नहीं उठाई।

(लेखिका साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार हैं)


घटते गए हैं व्यवहार में आने वाले शब्द

प्रो. कृष्ण कुमार

जब हम अखबार में पढ़ते हैं कि 'पीएम कोलमाइंस स्कैम पर स्टेटमेंट देंगे' तो भाषा के रास्ते समाज का नजारा पा जाते हैं। जाहिर है यह समाज शिक्षितों का समुदाय है, इसलिए उसकी भाषा को समस्त हिंदी समाज का प्रतिबिंब नहीं माना जा सकता। फिर भी यह एक बड़े तबके का प्रतिबिंब है- उसकी व्यक्त और दमित आकांक्षाओं का, उसके उपक्रम और आलस्य का, पर सबसे पहले उसकी उधेड़बुन का। भारत में शिक्षा की बेहतरी के नाम पर अंग्रेजी माध्यम शिक्षा का प्रसार समाज और सरकार दोनों के आलस्य का सम्मिलित फल है।

अंग्रेजी का विरोध एक समय में हिंदी के संघर्ष का प्रतीक बन गया था, आज वह हास्यास्पद दिखता है। मगर इस सच्चाई से कोई सिरफिरा ही इंकार करेगा कि अंग्रेजी एक सीमा के भीतर ही समझ और समझबूझ की भाषा बन सकती है। एक फलते-फूलते बहुभाषिक वातावरण में हिंदी समाज उसे अपनी भाषा का विकल्प बनाने पर आमादा है।

पुराने तर्क आज धो-पोंछकर दोबारा दिए जा रहे हैं, कुछ नए तर्क भी तैनात हैं। हिंदी में विज्ञान और टेक्नोलॉजी की शब्दावली का तर्क जंग खा चुका पर आज भी दिया जाता है और साथ में वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था में अंग्रेजी के महत्व की दलील दी जाती है।

इस तर्क प्रणाली का सम्यक उत्तर हिंदी में संभव है, दिया भी गया है, लेकिन हार की मंजूरी के स्वर में। पारिभाषिक शब्दकोश मोटे होते गए हैं, व्यवहार में आने वाले शब्द घटते गए हैं। बढ़ती नृशंसता के लिए हर स्वर में 'दरिंदा' और त्योहार के समाचार में 'श्रद्धालु' एक विराट संकुचन के द्योतक हैं। यह संकुचन हमारी रचनाशीलता पर छा रहे आलस्य और कल्पना पर छाई निराशा का है।

(लेखक पूर्व निदेशक, एनसीईआरटी हैं।)

मध्यवर्ग ने किया हिंदी से विश्वासघात

अशोक वाजपेयी

जीवनशैली और भाषा का घनिष्ठ संबंध्ा होता है। दुर्भाग्य से भूमंडलीकरण और इंटरनेट के आने के कारण जीवनशैली और भाषा दोनों ही बड़ी तेजी से बदल गए हैं। हिंदी सिकुड रही है यह हमें स्वीकार करना ही होगा। भले ही वह बाजार और सिनेमा में बढ़ रही हो लेकिन वह अलग पक्ष है। और सिर्फ हिंदी ही क्यों सभी भारतीय भाषाएं संकट में हैं। लेकिन हिंदी के साथ जो विश्वासघात उसके पढ़े-लिखे और संपन्न होते मध्यवर्ग ने किया है वैसी दूसरी मिसाल नहीं मिलती है। इस पूरे मध्यवर्ग ने हिंदी को छोड़ दिया है।

संख्याबल के आधार पर आज जरूर हम यह कहें कि हिंदी विश्वभाषा बन सकती है लेकिन हमें यह याद रखना होगा कि कोई भी भाषा बिना साहित्य, विचार, आर्थिकी के ऐसा दर्जा हासिल नहीं कर सकती है। हिंदी में इस तरह की तमाम आवाजाही बीते वर्षों में लगातार घटती गई है। अंचल के जो बुद्धिजीवी पहले हिंदी में शोध करना अपने लिए गौरव मानते थे वे भी अंग्रेजी के पाले में आ गए हैं।

मुझे लगता है कि हिंदी को लेकर हमें तीन मनोग्रंथियों से उबरने की जरूरत है- पहली, यह राजभाषा न बन पाई है और न ही बन पाएगी। इस स्वप्न से हिंदी का अहित ज्यादा हुआ है। बल्कि इस बात ने अन्य भारतीय भाषाओं से उसकी दूरी बढ़ाई भी है। दूसरा, विश्व हिंदी सम्मेलन एक ढकोसला ही है। हमें यह नहीं कहना चाहिए कि हिंदी एक अंतरराष्ट्रीय भाषा है क्योंकि दूसरे देशों में इसकी उपस्थिति वैसी नहीं है।

तीसरा, हमारी यह आकांक्षा की हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनना चाहिए। हमारे प्रयासों से हिंदी संयुक्त राष्ट्र में पहुंच भी गई तो उसे वहां बोलेगा कौन? ये तीनों मूर्ख किस्म के स्वप्न हैं जिनका टूटना जरूरी है।

(लेखक पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि हैं।)