बेंगलुरु। 58 साल के श्रीधर बिंदिगनाविल ने एक अनजान शख्स के लिए 200 किमी की यात्रा की जिसके उसका कहीं कोई संबंध नहीं थी। बेंगलुरु से वेल्लोर की यात्रा उन्होंने 35 साल के सिमधरी पोलकी को ब्लड डोनेट करने के लिए की। पोलकी का दुर्लभ 'बॉम्बे' ब्लड टाइप था। अगर वह दूसरे किसी ग्रुप का ब्लड लेता है तो उसकी जान भी जा सकती थी लेकिन श्रीधर का वहीं ग्रुप था।

पोलकी की स्थिति पता चलने के बाद श्रीधर ने तुरंत वेल्लोर के लिए ट्रेन पकड़ ली। पोलकी एक विजाग में कंस्ट्रक्शन सुपरवाइजर का काम करता था। उसे थैलेसीमिया डायग्नोस हुआ। कुछ दिन में उसका हीमोग्लोबिन सामान्य 12-16 के बीच न रहकर 5gm/dl तक गिरकर गया। परिवार वालों ने सोशल मीडिया के जरिए इस समस्या का हल तलाशने की कोशिश की और तब उन्हें श्रीधर का रेफरेंस मिला। एक ही दिन मेँ उनसे संपर्क हुआ और श्रीधर ने ट्रेन पकड ली, वेल्लोर पहुंच गए और ब्लड डोनेट किया।

तब भी थे सुर्खियों में

श्रीधर तब भी खबरों में आए थे जब 2015 में उन्होंने एक नवजात शिशु की जान बचाई थी। गोरखपुर का इस बच्चे संदेश कुमार को उसकी हार्ट कंडिशन के कारण सर्जरी के लिए ब्लड की जरूरत थी।

जब 'द थिंक फाउंडेशन' ने मुंबई में डोनर्स का पता किया तो श्रीधर रात को ही निकल और दो अन्य लोगों के साथ ब्लड डोनेट किया। इस ब्लड को दिल्ली भेजा गया जहां कुमार के पिता ने इसे कलेक्ट किया।

45 बार ब्लड डोनेट किया

बॉम्बे ब्लड टाइप एक रेअर ब्लड ग्रुप है जो कि दस हजार में से एक का होता है और इस ब्लड की कमी के कारण लाखों लोग भरते हैं। श्रीधर ब्लड डोनेट कर समाज के प्रति अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। वे रिटायर्ड सेंट्रल गर्वनेंट एम्लॉई है जिन्हें साल 2002 में पता चला था कि उनका ब्लड टाइप रेअर है। तब से अब श्रीधर ने अब तक 45 बार ब्लड डोनेट किया है।

ये है बॉम्बे ब्लड टाइप

दुनिया के सबसे दुर्लभ ब्लड टाइप का नाम बॉम्बे है क्योंकि इसकी खोज 1952 में हुई थी जब दो लोगों तो ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत थी। दोनों की बॉडी ने 160 डोनर्स का ब्लड रिजेक्ट कर दिया था। आखिर में एक बॉम्बे के रहवासी का ब्लड मैच हुआ तब से इसे बॉम्बे ब्लड टाइप कहा जाता है। तकनीकी रूप से इसे 'HH' ब्लड टाइप है जो आमतौर पर व्यापक आंतरिक प्रजनन के कारण होता है।