लखनऊ। लोकसभा चुनाव से पहले सपा और बसपा ने बड़ा फैसला लेते हुए गठबंधन की घोषणा कर दी है। शनिवार को लखनऊ के ताज होटल में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा चीफ मायावती ने एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए उसकी घोषणा की। हालांकि, इस गठबंधन से दोनों दलों ने कांग्रेस को दूर ही रखा है।

बसपा प्रमुख मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि हमने आने वाले लोकसभा चुनाव में एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। हमने यह फैसला 25 साल पहले राज्य में हुए गेस्ट हाउस कांड को भूलते हुए लिया है। इस गठबंधन के बाद सपा और बसपा दोनों ही 80 में से 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। वहीं रायबरेली और अमेठी की दो सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ दी गईं हैं।

मायावती ने कहा कि उपचुनावों में भाजपा को हराकर हमने रोकने की शुरुआत कर दी थी। इस चुनाव में तो कांग्रेस के उम्मीदवार की तो जमानत ज़ब्त हो गई थी। इसके बाद चर्चा शुरू हुई कि सपा बसपा साथ आ जाएं तो भाजपा को सत्ता में आने से रोका जा सकता है। दलितों, पिछड़ों, गरीबों, धार्मिक अल्पसंख्यक के हितों की उपेक्षा को देखते हुए गेस्ट हाउस कांड को किनारे करते हुए हमने गठबंधन का फैसला किया।

कांग्रेस के राज में घोषित इमरजेंसी थी और अब अघोषित। सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग कर प्रभावी विरोधियों के खिलाफ गड़े मुकदमे उखाड़ कर परेशान कर रहे हैं। कांग्रेस के साथ सपा बसपा गठबंधन का कोई खास फायदा नहीं होता। हमारे वोट तो ट्रासंफर हो जाता है लेकिन कांग्रेस का वोट ट्रान्सफ़र नहीं होता या अंदरूनी रणनीति के तहत कहीं और करा दिया जाता है। इसमें हमारी जैसी ईमानदार पार्टी का वोट घट जाता है। 96 में हमारे लिए कड़वा अनुभव था। 1993 में सपा बसपा का वोट ईमानदारी से ट्रांसफर हुआ था इसलिये गठबंधन कोई हर्ज नहीं है। अगर भाजपा ने पुर्व की तरह ईवीएम में गड़बड़ी नहीं की और राम मंदिर जैसे मुद्दों से धार्मिक भावनाओं को नहीं भड़काया तो बीजेपी एन्ड कंपनी को हम जरूर सत्ता में आने से रोकेंगे।

भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए एक बार फिर दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने गठबंधन किया है। दो वर्ष पूर्व विधानसभा चुनाव से पहले राजधानी लखनऊ के पांच सितारा ताज होटल में अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने "यूपी के लड़के" और "यूपी को यह साथ पसंद है" नारे के साथ चुनावी गठजोड़ किया था। सपा का तकरीबन ढाई दशक पहले बसपा से गठबंधन करने का फार्मूले हिट रहा था।

वहीं अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपा के घमंड को तोड़ने के लिए यह जरूरी था की सपा और बसपा साथ आएं। भाजपा हमारे कार्यकर्ताओं के बीच मतभेद पैदा करने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकती है लेकिन हमें साथ रहना होगा।

गठबंधन का मन तो उसी दिन बन गया था जिस दिन भाजपा के नेताओं ने मायावतीजी पर अशोभनीय टिप्पणी की थी और भाजपा ने उन पर कार्रवाई करने के बजाय।मंत्री बन इनाम दिया। गठबंधन का मन उसी दिन पक्का हो गया था जब राज्यसभा में भीमराव अंबेडकर को छल से हराया गया था। मायावती जी का धन्यवाद कि उन्होंने बराबरी का मान दिया। आज से मायावती जी का अपमान मेरा अपमान होगा। गठबंधन लम्बा चलेगा, स्थाई रहेगा और अगले विधानसभा चुनाव तक रहेगा।

पीएम उम्मीदवार के सवाल पर अखिलेश बोले कि यूपी ने हमेशा पीएम दिया है। हमे खुशी होगा कि यूपी से पीएम बने। आपको पता है कि हमे किसे सपोर्ट करेंगे।

इस घोषणा के साथ ही प्रदेश की राजनीति में धुर विरोधी माने जाने वाले सपा-बसपा का ढाई दशक बाद एक मंच पर आए हैं जो सूबे की सियासत का बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है।

1993 जैसे करिश्मे की आस

नब्बे के दशक में राम लहर पर बेक्र लगाने का काम भी सपा-बसपा गठबंधन ने किया था। तब बसपा के संस्थापक कांशीराम और सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने मिलकर 1993 में विधानसभा चुनाव लड़ा था। बाबरी ढांचा गिरने के बाद भाजपा का सत्ता में वापसी का ख्वाब भी टूट गया था। अब 25 वर्ष बाद मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव और कांशीराम की उत्तराधिकारी मायावती एक बार फिर से भाजपा को रोकने के लिए एका कर रहे हैं।