नई दिल्ली। महाराष्ट्र के एक मुस्लिम जोड़े ने सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर मांग की है कि वह सरकार को निर्देश दे कि मुस्लिम महिलाओं को मस्जिदों में प्रवेश करने और नमाज अदा करने की इजाजत मिले। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, केंद्रीय वक्फ परिषद, महाराष्ट्र राज्य वक्फ बोर्ड और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को नोटिस जारी किया है।

मुस्लिम महिलाओं को समानता का अधिकार, भेदभाव न करने का अधिकार और धर्म का अधिकार देने का दावा करते हुए, यासमीन जुबेर अहमद पीरजादे और उनके पति जुबेर अहमद नजीर अहमद पीरजादे ने कहा कि मुस्लिमों को मुसल्ला में प्रार्थना करने की अनुमति दी जानी चाहिए। पुणे के रहने वाले इस दंपति ने कहा कि इस्लामिक धर्म ग्रंथ कुरान और हदीस में ऐसा कुछ भी नहीं है कि मस्जिदों में नमाज अदा करने के लिए लिंग के आधार पर प्रवेश मिले।

याचिका में मुस्लिम दंपति ने केंद्र सरकार, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, केंद्रीय वक्फ परिषद, महाराष्ट्र राज्य वक्फ बोर्ड और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को पार्टी बनाया गया है। उन्होंने मक्का के उदाहरण का हवाला दिया, जहां पुरुष और महिलाएं दोनों ही काबा की परिक्रमा करती हैं।

इसके अलावा दुनिया में सबसे पवित्र मस्जिदें पुरुष और महिलाओं, दोनों को समान रूप से दोनों आने की इजाजत देते हैं। उन्होंने केरल के सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देने के उच्चतम न्यायालय के फैसले का हवाला भी दिया।

याचिकाकर्ता दंपति ने कहा कि सबरीमाला के मामले में माननीय अदालत ने कहा कि महिलाओं को पूजा के अधिकार देने से इनकार करने के लिए धर्म का इस्तेमाल कवर के रूप में नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह मानवीय गरिमा के खिलाफ है। महिलाओं पर प्रतिबंध गैर-धार्मिक कारणों से है और यह सदियों से चले आ रहे भेदभाव की गंभीर छाया है।

मुस्लिम दंपति ने मांग की है कि मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश करने पर रोक लगाने वाले सभी फतवे को रद्द कर दिया जाना चाहिए। महिलाओं के प्रवेश को मस्जिद में प्रतिबंधित करने से रोकने की परंपरा को बंद करना चाहिए और इसे गैर संवैधानिक घोषित करना चाहिए। इसके साथ ही इसे गैर-भेदभाव के अधिकार, समानता के अधिकार, सम्मान के साथ मानव के जीने का अधिकार, और धर्म के अधिकार का उल्लंघन घोषित करना चाहिए।

उन्होंने यह इंगित करते हुए कहा कि कुरान या हदीस में लिंग विभाजन का कोई उल्लेख नहीं है। दंपति ने कहा कि इस तरह की प्रथाएं महिलाओं की बुनियादी गरिमा के प्रति अपमानजनक थीं और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती थीं।

उन्होंने कहा कि ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है, जिसमें कहा गया हो कि कुरान और पैगंबर मुहम्मद ने महिलाओं को मस्जिदों में प्रवेश करने और नमाज अदा करने का विरोध किया हो। वास्तव में पुरुषों और महिलाओं को उनकी मान्यताओं के अनुसार पूजा करने के लिए समान संवैधानिक अधिकार हैं।