ग्वालियर। अमरचंद बांठिया बीकानेर से ग्वालियर आए थे। गुणी होने से वे शीघ्र ही तत्कालीन ग्वालियर नरेश महाराजा जयाजीराव सिंधिया की नजरों में चढ़ गए। महाराजा ने उन्हें 'गंगाजली" राजकोष का कोषाध्यक्ष बना दिया। इस राजकोष पर हमेशा सशस्त्र पुलिसबल का पहरा रहता था।

उन दिनों साधु-संन्यासी आजादी के संदेश प्रसारित करने का काम करते थे। एक वयोवृद्ध संन्यासी ने सन 1857 के विप्लव की एक घटना का जिक्र करते हुए बांठिया को बताया कि 700 बंगाली-सैनिकों की एक पूरी टुकडी को गोलियों से भूनकर मौत के घाट उतार दिया था।

मिला देश सेवा का मौका

सिर्फ इसलिए कि सैनिकों ने कहा था -'हमारे लिए गाय अवध्य है और बैल की पीठ पर बैठकर जाना पाप।" इस घटना ने बांठिया का कलेजा बींध डाला और वे अंग्रेजों को देश से खदेड़ देने के लिए छटपटा उठे।

मौका जल्द ही आया जब 1858 की भीषण गर्मी में लू के थपेड़ों के बीच, झांसी की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई तथा उनके योग्य सेना नायक राव साहब और तात्या टोपे आदि सब, अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करने के लिए ग्वालियर के मैदान-ए-जंग में आ डटे थे।

खोल दिया खजाना

यहां झांसी की रानी की सेना और ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों को कई महीनों से वेतन तथा राशन आदि का समुचित प्रबंध न हो पाने से संकटों का सामना करना पड़ रहा था। देश के ऐसे समय में ग्वालियर के भामाशाह अमरचंद बांठिया आगे बढ़े और महारानी लक्ष्मीबाई के एक इशारे पर ग्वालियर का सारा राजकोष विद्रोहियों के हवाले कर दिया। भविष्य में ऐसी मदद उन्होंने कई बार की।

उन दिनों ऐसी मदद का सीधा मतलब था मौत को बुलावा देना। 18 जून (कहीं 17 जून भी) 1858 को झांसी की रानी वीरगति को प्राप्त हो गई। उनके इस गौरवमय ऐतिहासिक बलिदान के चार दिन बाद ही 22 जून को ग्वालियर की इसी जमीन पर अमरचंद बांठिया को राजद्रोह के अपराध में गिरफ्तार कर लिया गया था। न्याय का ढोंग रचकर उन्हें फांसी दे दी गई।