बनारस, प्रशांत मिश्र। बचपन में बनारस में भी पली-बढ़ीं सिने अभिनेत्री मनीषा कोइराला अपनी मां सुषमा कोइराला के साथ काशी पहुंचती हैं। गाड़ी में बैठकर एयरपोर्ट से शहर की ओर प्रवेश करते हुए थोड़े अचरज के साथ चालक टीपू यादव से पूछ बैठती हैं- बनारस ही चल रहे हो न भैया? टीपू मुस्कुराते हुए उन्हें आश्वस्त करता है- जी मैडम, वहीं जा रहे हैं।

मनीषा अब भी विश्वास नहीं करती हैं, कहती हैं- ओह! इतना बदल गया बनारस। टीपू थोड़ा और संवाद बढ़ाता है और कहता है- मैडम जी, बाबा की नगरी है, इसे कौन रोकेगा, बाबा ने नरेंद्र मोदी को भेज दिया और सब कुछ दुरुस्त हो गया। इन चार वर्षों में बहुत काम हुए हैं। शहर घूमिए। आपको बदलाव ही बदलाव दिखेगा।

तीन दिन घूमने के बाद मनीषा कहती हैं-शहर सुंदर लगत बा। सिने स्टार अनुपम खेर ने तीन दिनों तक गंगा घाट से लगे रेल स्टेशन और शहर के पक्का महल का चक्कर लगाया। उन्होंने बदलाव महसूस किया। जौनपुर के सुफियान दुबई से कमाकर लौटते हैं तो उन्हें अपना शहर बदला हुआ नजर आता है।

मेरा भी वर्षों से आना-जाना रहा है। बदलाव की बहुत चर्चा सुनी, तो बाबा के दर्शन के बहाने पहुंच गया काशी। सच मानिए, चौक, ज्ञानवापी और गोदौलिया की गलियों में घूमते हुए लगा कि नए स्थान पर घूम रहा हूं। माथे के ऊपर झूलने वाले बिजली के तार गायब थे, सड़कें रोशन थीं, शरीर से टकराने वाली भीड़ भी नदारद थी। बिजली के तार अब भूमिगत हो गए हैं और हेरिटेज पोल और उस पर चमक रहीं एलईडी लाइट से सड़कें रोशन हो रही थीं। हर गली अपनी पारंपरिक धरोहर को बयां कर रही थी।

यह देखकर सुखद अनुभूति हुई जो गली जिस मंजिल की ओर से जा रही है, उसमें वहां का पूरा इतिहास दिखता है। जो गली बिस्मिल्ला खां के घर की ओर से जा रही है, उसमें घुसते ही आपको उनकी यादें ताजा करा दी जाएंगी। दीवारें उनकी कहानियां बयां करती हैं। बाबा के दरबार पर पहुंचने से पहले फिर वही अनुभूति हुई, लगा अनजान जगह पर हूं। दरअसल मंदिर के आसपास के घर खाली होने लगे हैं। बताते हैं कि वर्षों से आसपास बस गए लोगों ने हर्जाना लेकर खुशी-खुशी घर खाली कर दिया है। 296 घर खाली कराए जा चुके हैं, ताकि गंगा घाट से बाबा की दहलीज तक सीधा कॉरिडोर बन सके।

संभव है कि मंदिर से गंगा के दर्शन ही हो जाए। अब तक करीब 550 करोड़ रुपये हर्जाने में दिया जा चुका है। अस्सी घाट पर सुबह-ए-बनारस और शाम की गंगा आरती तो खैर कोई भी नहीं चूकता। हर बार की तरह इस बार भी गया और पहली बार खुशी हुई। गंदगी को देखकर हर बार मन कचोटता था, दिल बार-बार पूछता था कि सबको पावन करने वाली गंगा मैया क्या यूं ही मैली रहेगी।

पश्चिम के किसी भी देश में घूम आइए। अगर छोटी-सी नदी भी उसके भाग्य में मिली, तो उसको इतना सहेजकर रखा, जैसे वह रूठी तो दामन खाली हो जाएगा। हम गंगा को बनारस के घाटों तक पर सहेजकर नहीं रख सकते। इस बार गंगा घाट पर गया तो दिल को सुकून मिला। काफी लम्हा वहीं बैठा रहा, गंगा के विराट दर्शन हुए। मिंट हाउस पर चाय पीने के बाद कुल्हड़ डस्टबिन की ओर बढ़ाया तो फिर आश्चर्य भी हुआ।

क्या बनारसीपन भी खत्म हो गया? जो अलमस्त मिजाज है वह तो खैर नहीं बदलेगा, बदलना चाहिए भी नहीं लेकिन सफाई को लेकर आम बनारसी भी जागा है। वरना बनारस में तो डस्टबिन का क्या मतलब। तहजीब के साथ पान की पीक अगर डस्टबिन में डाली तो क्या बनारसी। दरअसल, कोई भी बदलाव न एक दिन में संभव है और न ही एक आदमी के वश की बात है।

सरकार और प्रशासन की एक सीमा है। बदलाव तो आम नागरिक ही कर सकता है। बनारस के लोगों ने बदलाव को सोचा है, यह बड़ी बात है। लेकिन इसके लिए माहौल बनाने का श्रेय यहां के सांसद और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही जाता है। उन्होंने बनारस से अपना आत्मीय रिश्ता जोड़ने में सफलता पाई है। लोगों ने उनका साथ दिया है। बनारस के सांसद चुने जाने के बाद मैंने मोदी को सुना था।

2014 में। बोल रहे थे। मेरी सामर्थ्य में नहीं कि बनारस बदल सकूं। यहां की विरासत में एक ईंट जोड़ सकूं, यही प्रयास करूंगा। शायद उन्होंने ईमानदारी से वचन निभाया है। विकास में मजबूत ईंट जुड़ी है। काशी.. यह किसी एक शहर का नाम भर नहीं हो सकता है। यह तो आभास है ज्ञान, श्रद्धा और समर्पण का। बाबा विश्वनाथ और गंगा मैया के विराट स्वरूप में रचने-बसने का। इस अनुभूति तक पहुंचने के लिए तो खैर व्यक्तिगत आचार, व्यवहार और जीवनशैली में बड़े बदलाव की जरूरत होगी। लेकिन, कहा जा सकता है कि जो कुछ बदलाव हुआ है वह बनारस को काशी बनाने की दिशा में सार्थक कदम साबित होगा।

बाबा विश्वनाथ मंदिर के आसपास घर खाली जरूर कराए गए हैं, लेकिन वह जबरन नहीं हुआ। बहुत ही सद्भाव के साथ, आपसी समझ के साथ लोग खुद ही इसके लिए तैयार हो गए और उन्हें पर्याप्त हर्जाना मिला। बनारस में जो कुछ विकास हुआ, उसमें जनता की भी भागीदारी है। - दीपक अग्रवाल, कमिश्नर, वाराणसी