मल्टीमीडिया डेस्क। यूपी में दो लोकसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव में सपा और बसपा की जोड़ी ने भाजपा को मात दे दी है। गोरखपुर और फूलपुर सीटों पर सपा ने अपने उम्मीदवार खड़े किए और बसपा ने समर्थन दिया। इस साझा रणनीति का असर बुधवार को नजर आया, जब भाजपा प्रत्याशी इतने पीछे हो गए हैं कि उनकी हार तय लग रही है।

बहरहाल, यह पहला मौका नहीं है जब सपा और बसपा की जोड़ी ने भाजपा का विजय रथ रोका हो। 25 साल पहले भी ऐसा हो चुका है। पढ़ें तब की सियासत के समीकरण -

मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम

मुलायम सिंह यादव ने 1992 में समाजवादी पार्टी बनाई थी। इसके एक साल बाद हुए चुनावों में उन्होंने बसपा के साथ गठबंधन कर लिया था। तब काशीराम बसपा प्रमुख थे। दोनों दलों में सीटों का बंटवारा हुआ और विधानसभा चुनाव में जीत भी मिल गई।

प्रदेश की कुल 425 विधानसभा सीटों में से सपा को 109 और बसपा को 67 सीटें मिली। 177 सीटें जितने के बाद भी भाजपा सरकार नहीं बना सकी थी। इसके बाद नारा भी दिया गया था कि 'मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम', क्योंकि भाजपा ने राममंदिर के मुद्दे पर चुनाव लड़ा था।

इसके बाद सपा-बसपा की सांझा सरकार बनी और मुलायम सिंह मुख्यमंत्री नियुक्त हुए। हालांकि यह दोस्ती ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकी। बसपा के समर्थन वापस लेते ही सरकार अल्पमत में आ गई।

...और फिर हुआ ऐसा कांड

इसके बाद एक और कांड ऐसा हुआ कि दोनों दलों में दोस्ती की रही-सही उम्मीद भी खत्म हो गई। यह था गेस्टहाउस कांड। 2 जून 1995 को मायावती लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस के कमरा नंबर एक में अपने विधायकों के साथ बैठक कर रही थीं।

तभी दोपहर करीब तीन बजे कथित समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं की भीड़ ने अचानक गेस्ट हाउस पर हमला बोल दिया। मायावती को गंदी-गंदी गालियां दी जा रही थीं। कई घंटों तक मायावती को कमरे में बंद रहना पड़ा।

इसके बाद अब यह पहला मौका था जब दोनों पार्टियां एक-दूसरे का सहयोग और समर्थन करने को तैयार हुई थीं।