अमित तिवारी, जमशेदपुर। दुनिया भर में दुर्लभ माना जाने वाला बॉम्बे ब्लड ग्रुप के सदस्यों ने झारखंड में अब तक कई लोगों की जान बचाई है। इस ब्लड ग्रुप के सदस्यों की संख्या बहुत ही सीमित होती है, लिहाजा इन्हें गुप्त रूप से व सहेजकर रखा जाता है। जमशेदपुर जिले के बिष्टुपुर स्थित ब्लड बैंक में कुल छह लोगों का नाम दर्ज है, जिनका ब्लड ग्रुप बॉम्बे है। प्रदेश भर में कहीं भी जरूरत पड़ने पर उन्हें फोन कर बुलाया जाता है।

आंकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष इस ब्लड ग्रुप की मांग 8-10 यूनिट होती है। कुछ दिन पूर्व ही रांची में एक सड़क दुर्घटना में घायल को इस ब्लड ग्रुप की जरूरत पड़ी। विशेषज्ञों के अनुसार बॉम्बे ब्लड ग्रुप देशभर में दुर्लभ है और अधिकांश लोग इससे अनजान हैं। सामान्य रूप से मुख्यतया चार ब्लड ग्रुप होते हैं। ए, बी, एबी और ओ। ज्यादातर लोगों का ब्लड ग्र्रुप इन्ही में से होता है।

खासतौर पर एशिया में करीब 39 फीसद लोग ओ पॉजिटिव होते हैं। लेकिन इससे परे एक और दुर्लभ ब्लड ग्रुप 'बॉम्बे ब्लड ग्रुप' होता है। ब्लड बैंक के अधिकारियों का कहना है कि बॉम्बे ब्लड ग्रुप रक्तदाताओं को गुप्त तरीके से रखा गया है, ताकि उनका गलत इस्तेमाल न हो सके।

क्यों दुर्लभ है बॉम्बे ब्लड ग्रुप

बॉम्बे ब्लड ग्रुप की लाल रक्त कोशिकाओं में एंटिजन ए, बी या एच मौजूद नहीं होता। बॉम्बे ब्लड ग्रुप की यही खासियत इसे अन्य ब्लड ग्रुप से अलग बनाती है। बॉम्बे ब्लड ग्र्रुप (एचएच) की खोज 1952 में मुंबई के एक हॉस्पिटल में डॉ वाईएम भेंडे द्वारा की गई थी।

इसी वजह से इस ब्लड ग्र्रुप को बॉम्बे ब्लड ग्रुप नाम दिया गया। भारत में 10 हजार लोगों में से एक में यह ब्लड ग्रुप पाया जाता है, जबकि यूरोप में 10 लाख लोगों में से एक में यह ब्लड ग्रुप होता है।

कहीं हो ना जाए भूल

बॉम्बे ब्लड ग्रुप में ए या बी एंटिजन न होने की वजह से इसे ओ ब्लड ग्रुप समझने की भूल की जा सकती है। इस भूल से बचने के लिए डॉक्टर रिवर्स ग्रुपिंग या सीरम ग्र्रुपिंग की सलाह देते हैं। इसे दुर्लभ मानते हुए कई संस्थाएं इस ब्लड ग्रुप को उपलब्ध कराने का काम करती हैं। इसमें थिंक फाउंडेशन, संकल्प इंडिया फाउंडेशन जैसी संस्थाएं प्रमुख हैं। इसके अलावा बॉम्बे ब्लड ग्र्रुप कम्युनिटीज भी हैं, जहां ऐसे ब्लड ग्र्रुप के लोग खुद को पंजीकृत कर सकते हैं।