महान क्रांतिकारी नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने अंग्रेजों के कब्जे में गुलाम बनकर रह रहे भारतीयों को आजाद होने का सपना दिखाया, मगर उन्हीं सुभाष बाबू का एक सपना ऐसा था, जो जीवन में कभी पूरा नहीं हो पाया। ऐसा नहीं था कि यह सपना कोई बहुत बड़ा था या इसका पूरा हो पाना असंभव था!

यह तो मामूली-सा था, लेकिन फिर भी नेताजी इसे अपनी आंखों में लिए-लिए ही विदा हो गए। यह सामान्य-सा स्वप्न था अपने लिए, अपने ही कमाए हुए पैसों से एक कार खरीदना। सुभाष बाबू बचपन से लेकर आजाद हिंद फौज गठन करने तक ये चाहते रहे कि कभी उनके पास उनका खुद का इतना पैसा हो कि वे अपनी मनपसंद कार खरीद सकें।

हालांकि उनका परिवार इतना समृद्ध था कि उन्हें बचपन से ही कार उपलब्ध थी। वे कारों के बहुत शौकीन थे और बाकायदा कलकत्ता (अब कोलकाता) से लेकर बंगाल की अंदरूनी सड़कों पर खूब कार चलाते। मगर वे हमेशा चाहते थे कि परिवार के अलावा वे अपनी एक कार खरीदें। नेताजी के इस स्वप्न में कार के प्रति उनका कोई विशेष प्रेम नहीं था, बल्कि यह भाव था कि एक भारतीय होने के नाते वे अंग्रेज अफसरों से कभी कमतर न दिखें।

साथ ही वे जब भी कलकत्ता की सड़कों पर निकलें तो अंग्रेजों की कार देखकर सहम जाने वाले भोले-भाले भारतीय नागरिक उन्हें देखकर गर्व महसूस कर सकें। मगर जनता के सच्चे नेता होने के कारण नेताजी कहलाए सुभाष बाबू बाद में अंग्रेजों को खदेड़ने संबंधी रणनीति बनाने, कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से निपटने और अंततः आजाद हिंद फौज के लिए रूस, जर्मनी, जापान आदि देशों की यात्राएं करने में इतने व्यस्त हो गए कि ये सपना पीछे छूट गया। और अंततः एक दिन विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु की खबर आ गई।