नीलू रंजन, नई दिल्ली। सीबीआइ के विशेष जज बीएच लोया की मौत का मसला नए सिरे से चर्चा में आने के बाद उनके पुत्र अनुज लोया का वह पत्र फिर से सुर्खियों में आ गया है जिसमें उन्होंने लिखा था कि उन्हें अपने पिता की मृत्यु के कारणों को लेकर कोई संदेह नहीं है। उन्होंने पत्र में लिखा था कि उन्हें, उनकी बहन और उनकी मां को इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि उनके पिता की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने की वजह से ही हुई थी।

अनुज ने लिखा था कि पिता की मृत्यु के बाद भावनात्मक दबाव के दौर में कुछ लोगों ने उनके दिमाग में मृत्यु के कारणों को लेकर भ्रम पैदा करने की कोशिश की थी। लेकिन, वास्तव में उनकी मृत्यु दिल का दौरा पड़ने की वजह से हुई थी और उनके उन सहकर्मियों के अथक प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका जो उस दौरान उनके साथ थे।

जज लोया की मौत की साजिश के ताने-बाने को गुजरात के सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ के इर्द-गिर्द बुना गया, जिसमें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह आरोपी थे। वैसे अदालत उन्हें इस मामले में क्लीनचिट दे चुकी है।मुंबई की स्थानीय अदालत में सीबीआई के विशेष न्यायाधीश लोया की मौत 30 नवंबर और एक दिसंबर 2014 की रात को हार्टअटैक से हुई थी, जहां वह एक सहयोगी न्यायाधीश की बेटी की शादी में शरीक होने गए थे। जाहिर है उनके साथ मुंबई के ही कई दूसरे न्यायाधीश भी थे।

खास बात यह है कि हार्टअटैक की सूचना मिलते ही बांबे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच के दो न्यायाधीश तत्काल उन्हें देखने अस्पताल पहुंच गए थे और उनकी मौत के समय सात न्यायाधीश अस्पताल में मौजूद थे। हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की देख-रेख में ही उनका पोस्टमार्टम हुआ और शव को उनके पैतृक गांव भेजा गया था। जाहिर है उनकी मौत पर किसी को आशंका नहीं हुई और किसी ने उसकी जांच की मांग भी नहीं की।

तीन साल बाद गुजरात चुनाव से ठीक पहले एक पत्रिका ने न्यायाधीश लोया की मौत के पीछे बड़ी साजिश का आरोप लगाते हुए खबर छापी। इसमें भी लोया के बेटे और पत्नी की ओर से कुछ नहीं कहा गया था। बल्कि उनकी बहन और पिता के हवाले से मौत के पीछे साजिश की आशंका और उसकी जांच की मांग उठाई गई थी। जाहिर है इस खबर को आधार बनाकर कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों ने भाजपा पर हमला बोल दिया।

लेकिन हफ्तेभर के भीतर एक राष्ट्रीय अखबार ने लोया की मौत के समय मौजूद हाई कोर्ट के दो मौजूदा न्यायाधीशों, जांच व पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों व अन्य चश्मदीद गवाहों से बातचीत कर रिपोर्ट छापी, जिसमें पत्रिका में लगाए गए आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया गया।

इस बीच बांबे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में इसकी उच्चस्तरीय जांच की मांग वाली याचिकाएं भी दाखिल कर दी गईं। याचिका कांग्रेस के सदस्य तहसीन पूनावाला की ओर से थी। मजेदार बात यह है कि न्यायाधीश लोया ने सोहराबुद्दीन केस की सुनवाई सिर्फ पांच महीने तक की थी।

2012 से 2014 तक इस केस की सुनवाई न्यायाधीश जेटी उत्पत कर रहे थे, 25 जून, 2014 को जिनका तबादला हो गया था। इसके बाद न्यायाधीश लोया को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई।