नई दिल्ली। मोदी सरकार ने भारतीय वायुसेना के लिए पूर्णरूपेण "मेक इन इंडिया" का मंत्र अपना लिया है। लिहाजा, केंद्र ने युद्धक विमानों की कमी पूरी करने को फ्रांस के 36 राफेल विमानों के अधिग्रहण की तादाद बढ़ाने की वायुसेना की अपील ठुकरा दी है। सरकार ने यह फैसला स्वदेशी हल्के युद्धक विमान तेजस के दम पर लिया है जिसे पिछले 32 सालों से तैयार किया जा रहा है। अभी भी दावा है कि वह 2017 तक तैयार हो जाएंगे। इसके अलावा, सरकार की दलील है कि उसके पास विदेशी युद्धक विमानों की खरीद के लिए पर्याप्त धन नहीं है।

सरकार ने यह अहम फैसला ऐसे समय में लिया है जब भारतीय सेना के पास युद्धक विमानों की खासी कमी है। हल्के युद्धक विमान (एलसीए) तेजस को तैयार करने की जद्दोजहद भी अब तक जारी है। सूत्रों के अनुसार वायुसेना चाहती थी कि सरकार फ्रांस निर्मित बहुआयामी भूमिका वाले मध्यम श्रेणी के और 44 राफेल विमानों के अधिग्रहण को मंजूरी दे।

हालांकि सरकार ने इससे फिलहाल इन्कार कर दिया है। जबकि मोदी सरकार ने आपात जरूरतों को पूरा करने के लिए पिछले ही साल केवल 36 राफेल विमानों के तत्काल अधिग्रहण की घोषणा की थी। रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने वायुसेना से कहा है कि राफेल विमानों के अधिग्रहण को विस्तार देने के लिए पर्याप्त कोष नहीं है। ध्यान रहे कि वन रैंक वन पेंशन को मंजूरी देने के चलते भारत सरकार पर दस हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ गया है।

रक्षा मंत्री ने साथ ही यह भी कहा कि वायुसेना को भारत में बन रहे युद्धक विमान तेजस-मार्क 1ए के संवर्द्धित रूप को अपने जंगी बेड़े में शामिल करना चाहिए। रक्षा अधिकारियों ने कहा कि वायुसेना के पास सर्वकालिक न्यूनतम विमान तो होने ही चाहिए। इस लिहाज से मौजूदा समय में सीमित संसाधनों को देखते हुए एलसीए तेजस सर्वोत्तम विकल्प है। राफेल विमान हमारे पास सबसे महंगे विमान हैं जबकि तेजस वायुसेना के पास मौजूद युद्धक विमानों की श्रेणी में अब तक के सबसे सस्ते विमान हैं।

तेजस के निर्माण में ऐतिहासिक देर

हालांकि तेजस के बनने में ऐतिहासिक देरी भारतीय वायुसेना की स्थिति को और भी चिंताजनक बना रही है। उल्लेखनीय है कि 1983 में तेजस के डिजाइन को सरकार ने मंजूरी दी थी। तब से इसे सरकारी रक्षा संस्थान डीआरडीओ बनाने में जुटा है। वैसे तो तेजस को 1994 में ही भारतीय वायुसेना में शामिल कर लिया जाना था, लेकिन अनेक कारणों से तीन दशकों की देरी हुई। इंजन समेत इसे दुनिया का सबसे हल्का युद्धक विमान बनाने की धुन में इसके इंजन को जीई बनाया गया। अब तक केवल एक तेजस विमान बनाने में कामयाबी मिली है। इसका भी अंतिम ऑपरेशनल क्लीयरेंस नहीं मिल सका है। अगर 2016 की शुरूआत तक यह संभव हुआ तो 2017 में इसे वायुसेना में शामिल करने के बारे में सोचा जा सकता है।

वायुसेना में युद्धक विमानों की कमी

भारतीय वायुसेना का कहना है कि उसे फिलहाल युद्धक विमानों के 45 बेड़े (स्कवाड्रन) की दरकार है। गौरतलब है कि भारतीय वायुसेना के एक स्कवाड्रन अमूमन 20 युद्धक विमान शामिल होते हैं। लेकिन आजकल एक स्कवाड्रन में कम से कम 16 विमान तक भी होते हैं। दूसरी ओर इस बात की भी चिंता जरूरी है कि इसी साल अप्रैल में आई संसद की रक्षा समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि वायुसेना के पास सक्रिय युद्धक विमानों की सिर्फ 35 टुकड़ियां हैं। यह 1962 के युद्ध के बाद से अब तक की सबसे बड़ी किल्लत है।

खासतौर पर युद्धक विमानों की यह कमी तब है जब देश पाकिस्तान और चीन की सीमाओं से दोहरा खतरा झेल रहा है। सोवियत युग के मिग-21 विमानों की खेप आना मना होने के बाद मौजूदा स्थिति को देखते हुए वर्ष 2022 तक भारतीय वायुसेना के पास मात्र 25 स्कवाड्रन विमान ही बच जाएंगे।

उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेक-इन-इंडिया नीति के तहत घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने के इस फैसले से फ्रांसीसी विमान निर्माताओं को झटका लगेगा बल्कि अरबों डालर के भारतीय सेना के उड्डयन बाजार पर मंडरा रही कई अन्य विदेशी कंपनियों की कमाई पर भी पानी फिर गया है। मालूम हो कि भारत रक्षा क्षेत्र में सबसे बड़ा आयातक देश है।