नई दिल्ली। विदेशी वकील, लॉ फर्म एवं कंपनियां भारत में कानूनी पेशे की प्रैक्टिस नहीं कर सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंगलवार को दिए गए इस आदेश का दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। शीर्ष अदालत ने ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस और आस्ट्रेलिया के 30 से ज्यादा फर्मों की सुनवाई की। इस मामले में शीर्ष अदालत ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को संशोधित भी किया है। यह मामला विदेशी वकीलों और लॉ फर्मों को कानूनी सेवा मुहैया कराने के लिए "आओ और जाओ" के आधार पर भारत आने की अनुमति देने से संबंधित है।

जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस यूयू ललित की पीठ ने कहा, "हम मानते हैं कि आओ और जाओ केवल अनौपचारिक दौरा होगा और यह प्रैक्टिस नहीं होगा।" यदि एक विदेशी वकील भारत में अपने मुवक्किल को विदेशी कानून या अपनी कानूनी प्रणाली और असमान अंतरराष्ट्रीय कानूनी मुद्दे पर सलाह देने के लिए खुद को अनौपचारिक आधार पर आना और जाना तक सीमित रखे हुए है। लेकिन इस पर विवाद पैदा होने की दशा में या विदेशी वकील जो काम कर रहा है वह प्रतिबंधित है, इसका निर्धारण बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा किया जा सकता है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया या केंद्र सरकार के पास इस संबंध में उपयुक्त नियम बनाने की स्वतंत्रता होगी। एडवोकेट एक्ट और बार काउंसिल रूल्स का हवाला देते हुए शीर्ष अदालत ने फैसले के पैरा 63 (आइ) में बांबे हाई कोर्ट और मद्रास हाई कोर्ट के विचार को बरकरार रखा। विदेशी लॉ फर्म/कंपनियां या विदेशी वकील भारत में न तो मुकदमे में और न ही गैर मुकदमेबाजी पक्ष में कानूनी पेशे की प्रैक्टिस कर सकेंगे।