फैजाबाद। गुमनामी बाबा उर्फ भगवन जी उर्फ साधु उर्फ अनाम संत जैसे नामों से वर्षों तक गुमनामी की जिंदगी जीने वाले गुमनामी बाबा को अपनी पहचाने छिपाने के लिए लगातार ठिकाना बदलना पड़ा।

मुखर्जी आयोग के बक्से से मिले सबूत बताते हैं कि उन्होंने पहला पड़ाव नेपाल सीमा पर किसी गांव में बनाया। संभवतः यह गांव शोलापुरी था। फिर नैमिषारण्य, जो सीतापुर जिले में है। वहां से बस्ती जिले के एक गांव चले गए। अगला पड़ाव अयोध्या का लखनउवा मंदिर और अंतिम पड़ाव फैजाबाद के सिविल लाइंस स्थित राम भवन में रहा। उन्होंने सदैव अपने चेहरे को भी छिपाया।

बुधवार को कोषागार के डबल लॉक से निकाले गए सबूतों में रोलेक्स रिस्ट वाच, ओमेगा रिस्ट वाच व आकर्षित करने वाली कोरोनोमीटर है। यह लाकेट घड़ी उसी तरह है जैसी गांधी जी कमर में लटकाते थे। पत्र तो बेशुमार हैं। सभी पत्र एक ही तरफ इशारा करते हैं। आजाद हिद सेना के प्रमुख रहे पवित्र मोहन राय का पत्र गुमनामी बाबा की कुंडली के बारे में बताता है। कुंडली कहती है कि 1944-45 में कोई दुर्घटना नहीं हुई है। ज्योतिषी ने जैसा बताया था, 1945 के बाद वही हो रहा है। 1955-60 में बड़े रोग से आक्रांत होना बताया, धर्मशाला में आप बीमार पड़े। इसी पत्र में संतोष, दुलाल, विजय व बाबू सुकृत का भी उल्लेख है। आशंका है कि ये गुमनामी बाबा से गुपचुप जुड़े थे।

14 जुलाई 77 को भेजा गया बांग्ला भाषा का पत्र है, जिसमें पवित्र मोहन राय ने सपने के सहारे सोच को बयां किया है। लिखा है कि 19 जुलाई को पहुंचा, आपने कुछ विशिष्ट लोगों की जानकारी चाही है। आगे सपने का जिक्र कर बताया गया है कि समय 1930 का वर्ष का है, पितृ देव का कर्मस्थल मैमन सिह, जिला टांगा का कोई गांव है, जहां काली जी मूर्ति की स्थापना गयी।

देखा रास्ते में सतगुरु चले आ रहे हैं, गेरुआ वस्त्र पहने हैं, महराज पूर्वी पाकिस्तान के हैं, भारत में रहने लगे हैं। आपके अखंड भारत का स्वप्न को जानकर उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान में ही रह कर काम करने की इच्छा जताई है। बासंती देवी ने आपका समाचार जानने के बारे में कहा है।

आनंद बाजार पत्रिका के 25 सितंबर 1974 से 22 सितंबर 1974 के अंक मिले हैं। आर्टिकिल लेखक वरुण सेन गुप्त का आर्टिकिल ध्यान खींचता है। क्या ताइहाकू विमान दुर्घटना सजाई हुई दुर्घटना थी। लेखक ने खोसला कमीशन में वकीलों की दलीलों को झूठा साबित किया है। यह भी सिद्ध किया है कि वह भविष्य में इसका प्रमाण भी प्रस्तुत कर सकता है।

लेखक ने आजाद हिंद फौज की महिला खुफिया शाखा की मुखिया लीला राय के हवाले से उल्लेख किया है कि उन्होंने क्या मृत्यु के पूर्व नेता जी का बयान लिया था। कुछ लोग मानते हैं कि नेता जी जीवित हैं। लीला राय कुछ चुने हुए लोगों को लेकर नेपाल सीमांत नैमिषारण्य में एक साधु के पास ले गयीं। लीला राय ने साधु की वाणी मासिक पत्रिका में कई माह तक छापी थीं। महामानव या साधु ही नेता जी थे, यह स्पष्ट नहीं कहा जा सकता।