आगरा। सरहद के उस पार एक भारतीय संत को उनका खोया सम्मान आखिर मिल ही गया। पाकिस्तान की सर्वोच्च अदालत ने 18 साल पहले संत परमहंस दयाल जी (अद्वैतानंद) की समाधि पर किए गए अवैध कब्जे को ध्वस्त करा दिया है। इसके साथ ही समाधि की पुनर्स्थापना और उसकी सुरक्षा के आदेश भी दिए हैं।

पाकिस्तान मुस्लिम लीग के सांसद और अधिवक्ता रमेश कुमार वंकवानी ने कई साल चली कानूनी लड़ाई के बाद भारतीय संत के सम्मान की लड़ाई जीती। 18 अप्रैल को कराची में समाधि पर किए कब्जे को ध्वस्त कर दिया। संभवतः यह पहला मौका था जब पाकिस्तानी अदालत के किसी फैसले का जश्न सरहद के इस पार भी मनाया गया। अदालत के निर्णय के बाद वहां संत के भक्तों ने पूजा अर्चना भी शुरू कर दी है।

संत के अनुयाइयों ने समाधि की पुनर्स्थापना में योगदान देने की पेशकश पाकिस्तान मुस्लिम लीग के सांसद, अधिवक्ता और मुकदमे के वादी रमेश कुमार वंकवानी से की थी, लेकिन खुद संत परमहंस दयाल के भक्त सांसद ने कोई सहयोग लेने से इन्कार कर दिया। सांसद का भक्तों से कहना था कि समाधि का निर्माण वह खुद कराएंगे।

कौन हैं संत परमहंस दयाल जी

संत परमहंस दयाल जी का जन्म बिहार के छपरा में वर्ष 1844 में रामनवमी को हुआ था। 12 साल की उम्र में आत्मज्ञान प्राप्त होने के बाद उन्होंने घर छोड़ दिया। सन्यासी बनने के बाद कुछ दिन काशी में रहने के बाद लंबे अर्से तक आगरा में रहे। इसके बाद रोहतास (राजस्थान) चले गए।

संत परमहंस दयाल जी ने अपना सिर्फ एक ही शिष्य बेरी जी को बनाया था। वह कराची के टेहरी नामक स्थान के रहने वाले थे। संत काशी, आगरा और रोहतास के बाद कराची अपने शिष्य के पास चले गए। शिष्य को दीक्षा देने के बाद उसका नाम स्वरूपानंद रख दिया।

स्वरूपानंद के परिजनों से अनुमति लेकर संत परमहंस 1884 में उन्हें अपने साथ आगरा ले आए। यहां न्यू आगरा के नगला पदी में जमीन खरीदी, वहां गुफा खोद शिष्य को तपस्या के लिए बैठा दिया। मान्यता है कि बाबा ने उक्त स्थान पर अपना त्रिशूल गाड़ने के बाद दीप प्रज्वलित किया था, जो आज तक जल रहा है। स्वरूपानंद जी ने 13 साल तक तपस्या की। इस दौरान संत जयपुर में रहे।

वचन निभाने लौटे थे कराची

संत परमहंस ने कराची में रहने वाले अपने भक्त सेठ अमीरचंद को वचन दिया था कि वह देह का त्याग कर उसके यहां समाधि लेंगे। शिष्य की तपस्या पूरी होने के बाद संत परमहंस सेठ अमीर चंद को दिया वचन निभाने कराची पहुंचे। उन्होंने 1919 में अपनी देह का त्याग कर समाधि ली। आजादी के पचास साल बाद तक वहां पूजा होती रही। वर्ष 1997 में कट्टरपंथियों ने समाधि को तोड़ दिया उस पर मकान बना दिया।

दंत समाधि की कहानी

आजादी के दौरान भारत-पाकिस्तान का बंटवारा होने पर सेठ अमीरचंद को कराची से छोड़ कर भागना पड़ा। वह संत परमहंस दयाल के दंत और केश अपने साथ लेकर आए थे। परमहंस दयाल जी की चौथी पीढ़ी से संबंधित स्वामी पूर्णानंद जी के मुताबिक संत की भारत में दो समाधि हैं।

न्यू आगरा के नगला पदी में दंत और जयपुर में दिल्ली हाइवे स्थित लाल डोंगरी में पहाड़ पर गणेश मंदिर पर उनके केश समाधि है। जयपुर के राजा माधो सिंह समेत कई महाराजा उनके शिष्य थे। संत परमहंस के शिष्य स्वरूपानंद की समाधि मेरठ के नंगली में हैं। उनके एक हजार सन्यासी शिष्यों ने नंगली में स्वरूपानंद का भव्य मंदिर बनाया है।

गुना में सबसे बड़ा मठ

संत परमहंस अद्वैतानंद के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। चौथी पीढ़ी के शिष्य पूर्णानंद जी ने बताया मध्य प्रदेश के गुना में परमहंस का सबसे बड़ा मठ है, 11 वर्ग किलोमीटर में फैले इस मठ में करीब पांच सौ साधु रहते हैं।

फेसबुक से मिली जानकारी

सरहद पार संत के सम्मान की कानूनी लड़ाई जीतने की जानकारी के बाद यहां रहने वाले भक्तों ने सांसद रमेश कुमार से फेसबुक के माध्यम से संपर्क किया। पूर्णानंद जी के मुताबिक उन्होंने और अन्य लोगों ने फेसबुक पर सांसद से संपर्क कर उनको बधाई दी है।