नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र ने विश्व में पोषण सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए भारत की पहल पर मुहर लगा दी है। यूएन खाद्य एवं कृषि संगठन के 26वें सत्र की पिछले सप्ताह हुई बैठक में यह फैसला लिया गया। इसके तहत 2023 को मोटा अनाज वर्ष घोषित किया जाएगा।

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की बैठक में शामिल भारतीय प्रतिनिधि कृषि आयुक्त डॉक्टर सुरेश मल्होत्रा ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारतीय प्रस्ताव का चीन, रूस, माली, अफ्रीकी यूनियन, नाइजीरिया, सेनेगल, इथोपिया व जिंबाब्वे समेत कई देशों ने समर्थन किया है।

भारत ने इस बाबत अपना अनुरोध पहले ही भेज दिया था, जिसमें वर्ष 2019 को ही मोटा अनाज वर्ष घोषित करने का आग्रह किया था। दलील दी गई थी कि मोटे अनाज वाली फसलों की खेती से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में मदद मिलेगी। एफएओ की रोम में हुई बैठक में डॉक्टर मल्होत्रा ने यह प्रस्ताव रखा, जिसे स्वीकार कर लिया गया।

बैठक में अपनी संक्षिप्त प्रस्तुति में ही डॉक्टर मल्होत्रा ने मोटे अनाज के फायदे गिना डाले। उन्होंने कहा कि बदलती जीवन शैली के चलते मोटापा और डायबिटीज जैसे रोग तेजी से पांव पसार रहे हैं। इन पर काबू पाने के लिए पोषक तत्वों से भरपूर मोटे अनाज वाली फसलें बेहद अहम साबित होंगी। जलवायु परिवर्तन से खेती पर मंडरा रहे खतरे की चुनौती से भी लड़ने का माद्दा इन फसलों में है।

वैश्विक स्तर पर इन फसलों की जबरदस्त मांग भी है। लोगों के खानपान में मोटे अनाज से तैयार चीजों की जरूरत बढ़ती जा रही है। गांव के साथ शहरों में भी इसकी मांग बढ़ी है। गरीबों के साथ अमीर उपभोक्ताओं का रुझान भी इस ओर हुआ है।

इस बढ़ती मांग के चलते किसानों की हालत में सुधार होगा। भारत ने अपने इस प्रस्ताव के पक्ष में सदस्य देशों से भी समर्थन का आग्रह किया था, जिसके लिए सभी सदस्य देशों के पास प्रस्ताव भेजा गया था। पांच अक्टूबर की बैठक में प्रस्ताव आने पर इस पर चर्चा हुई और तमाम देशों ने इसके पक्ष में हामी भरी।

दरअसल, भारत में चालू वर्ष 2018 को ही मोटे अनाज वाला वर्ष घोषित कर दिया गया है। छोटे दाने वाली इन फसलों के लिए कम उपजाऊ जमीन भी काफी लाभप्रद साबित होती है। असिंचित क्षेत्रों में भी इसकी खेती होती है। इनमें ज्वार, बाजरा, रागी, सांवा, कोदो और अन्य कई फसलें शामिल हैं।

खराब मौसम और बारिश की कमी अथवा अधिकता होने की दशा में भी इन फसलों की पैदावार प्रभावित नहीं होती है। अफ्रीका के एक छोर से दूसरे छोर तक भी इनकी खेती होती है। यह किसानों के लिए कठिन समय में बेहद विश्वसनीय होती है।