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    सरकारी नौकरी वाले परिवारों को मनरेगा में रोजगार अजीब : SC

    Published: Tue, 13 Feb 2018 10:05 PM (IST) | Updated: Tue, 13 Feb 2018 10:10 PM (IST)
    By: Editorial Team
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    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मनरेगा योजना पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जिनके परिजन सरकारी नौकरियों में हैं अगर उन लोगों को भी हर साल सौ दिन का रोजगार मनरेगा के अधिनियम के तहत मिल रहा है, तो यह बहुत ही अजीब बात है। जबकि इस योजना का मकसद उन लोगों को रोजगार देना है जिनके पास आय का कोई साधन नहीं है।

    महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत जॉब कार्ड के मुद्दे पर जब जस्टिस मदान बी. लोकुर और एनवी रमन्ना की खंडपीठ ने पूछा कि अगर चार लोगों के एक परिवार में दो लोगों को सरकारी नौकरी मिल जाती है, तब जॉब कार्ड का क्या होगा? क्या उसे सरकार को वापस किया जाएगा?

    इसके जवाब में याचिकाकर्ता और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि अधिनियम में इसका उल्लेख नहीं है। जबकि केंद्र की पैरवी कर रहे वकील ने कहा कि वह इसके बारे में जानकारी लेकर बताएंगे। प्रशांत भूषण की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अगली सुनवाई की तारीख 5 मार्च सुनिश्चित कर दी। उस दिन केंद्र सरकार की ओर से अटर्नी जनरल केके वेणुगोपाल अपनी दलीलें रखेंगे।

    दरअसल, प्रशांत भूषण के एक गैर सरकारी संगठन स्वराज अभियान ने सर्वोच्च अदालत में आरोप लगाया है कि मनरेगा योजना के तहत राज्य लोगों को रोजगार मुहैया नहीं करा पा रहे हैं क्योंकि केंद्र सरकार उन पर ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के लिए निर्धारित कोष से कम रकम लेने का दबाव बना रही है।

    उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार खंडपीठ को पहले ही बता चुकी है कि उसने अधिनियम के तहत रोजगार के दिन कम करने या बजट कम करने की कोई बात नहीं कही है और ना ही किसी राज्य का फंड रोका है। उसने बताया कि वित्तीय वर्ष 2016-17 में बीस राज्य तय बजट से ऊपर चले गए थे। फिर भी केंद्र ने उन्हें धन मुहैया कराया है।

    इससे पहले, भूषण ने खंडपीठ को बताया कि त्रिपुरा समेत कुछ राज्यों ने केंद्र को लिखा है कि जब तय बजट खत्म हो जाता है तो राज्य लोगों को रोजगार मुहैया नहीं करा पाते हैं। वर्ष 2017-18 में इसके लिए कुल 48,500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय से 17,567 करोड़ का अतिरिक्त फंड मांगा लेकिन उसे केवल 7000 करोड़ रुपये ही मिले।

    भूषण ने त्रिपुरा का उदाहरण दिया तो केंद्र के वकील ने कहा कि त्रिपुरा में अलग मामला है क्योंकि वह भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। एनजीओ ने आरोप लगाया है कि उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार, हरियाणा, छत्तीसगढ़ समेत 12 राज्यों में कई स्थानों पर सूखा पड़ा। फिर भी प्रशासन अपेक्षित राहत नहीं दे रहा है।

    प्रशांत भूषण का आरोप है कहा कि मनरेगा के तहत हर साल प्रति परिवार को सौ दिन के रोजगार की गारंटी मिलनी चाहिए। लेकिन केंद्र सरकार पर्याप्त फंड मुहैया नहीं करा रही है। आज आधे से अधिक राज्य सरकारें उसी पार्टी की हैं, जिससे केंद्र सरकार नियंत्रित है। इसलिए केंद्र इन राज्यों से कह रहा है कि वह इस बात को लेकर शोरगुल न करें। वह इसका बजट ही कम कर देंगे।

    प्रशांत भूषण ने कहा कि बजट तभी सीमित किया जा सकता है जब हर साल प्रति परिवार सौ दिन से अधिक के रोजगार का लक्ष्य पार हो जाए। अन्यथा सरकार इसका बजट कम नहीं कर सकती है। उन्होंने दावा किया कि केंद्र सरकार राज्यों पर इसे सौ दिन के रोजगार के बजाय मात्र 40-45 दिन करने का दबाव बना रही है।

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