सुरेंद्र सिंह, जम्मू। चिनाब किनारे बसे अखनूर के छोटे सा गांव संगानी की रहने वाली ज्योति न सिर्फ अपने गांव की बेटियों, बल्कि पूरे देश की बेटियों के लिए मिसाल बन गई हैं। जिस गांव में अधिकांश परिवार परंपराओं और रूढ़ियों में सिमटे हैं और कुछ समय पहले तक बेटियों के घर से निकलने पर भी पाबंदी थी। वहीं से निकली ज्योति ने खेतों में ट्रैक्टर चलाकर न सिर्फ पिता का हाथ बंटाया, बल्कि अब बीएसएफ में शामिल होकर देश सेवा भी कर रही हैं।

इस गांव में नौकरी करना तो दूर, लड़कियां साइकिल चलाने से भी हिचकती थीं। मगर, इन्हीं हालात के बीच ज्योति ने खेतों में ट्रैक्टर चलाकर परिवार को संभाला और अब सरहदों की रक्षा कर रही हैं। अपने जज्बे से ज्योति जम्मू के इस इलाके में इस बदलाव की प्रतीक बन गई हैं। उनके जज्बे से प्रभावित हो अन्य बेटियां न सिर्फ स्वावलंबी बन रही हैं, बल्कि समाज भी इस बदलाव में उनका साथ दे रहा है।

ज्योति अखनूर ही नहीं पूरे क्षेत्र की आंखों की नूर बन चुकी हैं। ज्योति देवी छह बहनों में पांचवें नंबर पर हैं। इस महंगाई के दौर में उनके पिता पर पूरे परिवार को पालने की जिम्मेदारी थी, जो आसान नहीं था। आगे बढ़कर ज्योति ने पिता के कंधे से कंधा मिलाया और खेतों में ट्रैक्टर चलाकर परिवार को संभालने में अपने पिता का हाथ बंटाया।

वह जम्मू कश्मीर की पहली ऐसी युवती हैं, जिसके पास ट्रैक्टर चलाने का लाइसेंस है। ज्योति के पिता सोबा राम खेती के साथ शटरिंग का काम भी करते हैं। पिता पर बोझ बढ़ता देख धीरे-धीरे ज्योति ने उनका हाथ बंटाना शुरू किया और खेती संभालने लगीं।

धीरे-धीरे उन्होंने ट्रैक्टर चलाना सीख लिया। करीब दो वर्ष पहले ज्योति ने आरटीओ कार्यालय जम्मू से ट्रैक्टर चलाने का लाइसेंस हासल किया। यह जम्मू-कश्मीर में किसी महिला को ट्रैक्टर चलाने के लिए दिया गया पहला लाइसेंस था। ज्योति न केवल खेती करतीं, बल्कि ट्रैक्टर लेकर शटरिंग का सामान भी पहुंचाने को जाने लगीं।

शुरू में लोगों को उसे ट्रैक्टर चलाता देख हैरानी हुई और कुछ लोगों ने आपत्ति भी जताई। पिता को नसीहत भी दी गई, पर पिता ने इन बातों को दरकिनार कर बेटी को आगे बढ़ने दिया। उसके बाद ज्योति यहीं नहीं थमीं और देश सेवा की राह चुन ली। अपने हौसले की बदौलत वह लिखित परीक्षा व अन्य चुनौतियां पार कर बीएसएफ में भर्ती होने में कामयाब हो गईं।

पिता सोबा राम कहते हैं, जो लोग पहले मुझे नसीहतें देते थे और अब वही कहते हैं कि उनकी बेटी भी ज्योति जैसी बने। ज्योति ने आरटीओ कार्यालय में ट्रायल देकर ट्रैक्टर का लाइसेंस हासिल किया। उस समय वहां तैनात आरटीओ एके खजूरिया उसके जज्बे को देखकर हैरानी भी जताते हैं और उसके हौसले को सलाम भी करते हैं।

वह कहते हैं, वास्तव में ऐसी बेटी पर सब को गर्व होना चाहिए। ज्योति कहती हैं कि वह बचपन से ही सुरक्षा बलों में जाने का सपना देखा करती थीं। बारहवीं कक्षा में पढ़ते हुए तैयारी शुरू कर दी थी और पहले ही प्रयास में बीएसएफ में भर्ती हो गई।

ज्योति कहती हैं, गर्व है कि देश की सेवा करने का मौका मिला है। अपने इलाके में लड़कियों की रोल मॉडल बन चुकी ज्योति गांव की बेटियों को अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए प्रेरित करती है। ज्योति का कहना है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं है। बस आपका इरादा ठीक होना चाहिए।