ओस्लो। इस साल नोबेल शांति पुरस्कार सौहार्द्र का प्रतीक बनकर सामने आया है। 2014 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से भारत और पाकिस्तान की झोली में गया है। इस पुरस्कार के लिए भारत में बाल अधिकारों के लिए कार्य करने वाले कैलाश सत्यार्थी और लड़कियों की पढ़ाई के लिए संघर्ष करने वाली पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई को चुना गया है।

नोबेल पुरस्कार समिति ने शुक्रवार को दोनों के नामों की घोषणा की। मदर टेरेसा के बाद शांति का नोबेल पुरस्कार पाने वाले सत्यार्थी दूसरे भारतीय हैं। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई गणमान्य लोगों ने सत्यार्थी को पुरस्कार के लिए बधाई दी है। पुरस्कार 10 दिसंबर को दिया जाएगा। पुरस्कार के रूप में 11 लाख डॉलर (करीब 6 करोड़ 74 लाख रुपये) दिए जाएंगे।

कैलाश सत्यार्थी भारत में एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) का संचालन करते हैं। यह एनजीओ बाल श्रम और बाल तस्करी में फंसे बच्चों को मुक्त कराने की दिशा में कार्य करता है। नोबेल पुरस्कारों की ज्यूरी ने कहा, "नार्वे की नोबेल कमेटी ने बच्चों और युवाओं पर दबाव के विरुद्ध और सभी बच्चों को शिक्षा मुहैया कराने के लिए किए गए संघर्षों को देखते हुए कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई को 2014 का नोबेल शांति पुरस्कार देने का फैसला किया है।"

नोबेल कमेटी ने कहा कि "बचपन बचाओ आंदोलन" नामक एनजीओ चलाने वाले सत्यार्थी ने गांधी जी की परंपरा को कायम रखा है और वित्तीय लाभ के लिए बच्चों के शोषण के खिलाफ कई शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों की अगुआई की है।

रगमार्क बनाने का श्रेय

कैलाश सत्यार्थी ने बाल मजदूरी के खिलाफ वैश्विक मंच बनाया, जो अनेक देशों में सक्रिय है। उन्हें 1994 में रगमार्क की स्थापना का भी श्रेय है जो अब गुड वेव के रूप में जाना जाता है। यह दक्षिण एशिया में एक तरह का बाल श्रम मुक्त का सामाजिक प्रमाण-पत्र है। उन्हें पहले भी कई बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया था।

जीवन दांव पर होने के बावजूद मलाला ने जारी रखा संघर्ष

तालिबान के हमले में जीवन को दांव पर लगाने के बाद भी मलाला ने पाकिस्तान जैसे देश में बाल अधिकारों और बालिका शिक्षा के लिए अपना संघर्ष साथ जारी रखा। नोबेल पुरस्कार की घोषणा के वक्त मलाला बर्मिंघम के स्कूल में पढ़ाई कर रही थी। मलाला पिछले साल भी नोबेल शांति पुरस्कार की दौड़ में थीं।

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कमेटी ने कहा, "अपनी कम उम्र के बावजूद मलाला ने लड़कियों की शिक्षा के लिए कई साल संघर्ष किया है। उन्होंने यह साबित किया है कि बच्चे और युवा भी अपनी स्थिति को सुधारने में योगदान कर सकते हैं।" उन्होंने सर्वाधिक खतरनाक स्थिति में यह सब किया है। अपने नायक सरीखे व्यक्तित्व के कारण मलाला लड़कियों के शिक्षा के अधिकार की अग्रणी प्रवक्ता बन गई हैं।

सबसे कम उम्र की विजेता

17 वर्षीय मलाला नोबेल पुरस्कार जीतने वाली सबसे कम उम्र की शख्सियत हैं। इसके पहले सबसे कम उम्र में नोबेल पुरस्कार पाने वाले ऑस्ट्रेलिया मूल के ब्रिटिश वैज्ञानिक लॉरेंस ब्रेग थे जिन्हें 25 साल की उम्र में अपने पिता के साथ 1915 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला था।

कैलाश सत्यार्थी

जन्म : 11 जनवरी, 1954

विदिशा, मध्य प्रदेश

बाल अधिकारों के लिए 1980 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की नौकरी छोड़ दी। वे अब तक 80 हजार बाल मजदूरों को मुक्त करा चुके हैं।

मलाला यूसुफजई

जन्म : 12 जुलाई 1997

मिंगोरा, पाकिस्तान

मलाला को 2012 में पाकिस्तान में महिलाओं के लिए शिक्षा को अनिवार्य बनाए जाने की मांग के बाद तालिबान की गोली का शिकार होना पड़ा था।