मल्‍टीमीडिया डेस्‍क। 17 वीं लोकसभा के लिए चल रही निर्वाचन प्रक्रिया के तहत, चुनावी प्रचार - प्रसार का शोर 7 वें और आखिरी चरण के एक दिन पूर्व पूरी तरह से थम चुका है। अब नेता केवल जनसंपर्क के माध्यम से अपने प्रचार में लगे हैं। इसी बीच चर्चा चल पडी कि आखिर 2019 के लोकसभा चुनाव में ऐसी क्या हलचल हुईं कि इसे याद रखा जाएगा।

इस चुनाव में कुछ ऐसी बातें रही हैं जो कि इसे बेहद अलग बनाती है। हांलाकि लोकसभा चुनाव के इस दौर में प्रारंभ से ही नेताओं की बयानबाजी से कथिततौर पर सांप्रदायिक तनाव और आपसी वैमनस्य बढ़ने लगा था लेकिन चुनाव आयोग की सख्ती के चलते प्रचार - प्रसार और मतदान के कार्यक्रम में निष्पक्षता देखने को मिली।

लोगों के बीच चुनावी कार्यक्रम को लेकर चर्चा रही। कुछ लोगों ने चुनाव आयोग की सक्रीयता की सराहना की तो कुछ ने चुनाव में राष्ट्रहित और वर्ग विशेष के बीच छाए मतभेद को चुनावी हवा से सुलगाने के राजनीतिक प्रयास की निंदा भी की।

रविवार को लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण के तहत 7 राज्यों की 59 सीटों पर मतदान होगा। इन सीटों पर कई दिग्गजों का राजनीतिक भविष्य ईवीएम में बंद हो जाएगा। इसी के साथ जीत और हार के दावों पर जनता की अंतिम मुहर लगेगी।

रविवार को होने वाले मतदान और इसके बाद आने वाले परिणामों को लेकर लोग चुनावी चकल्लस में लगे हुए हैं। वैवाहिक समारोह में लोगों को फुर्सत के पल मिलते ही लोग चुनावी चर्चा में लग जाते हैं कि आखिर किसकी सरकार बनेगी। ममता दीदी के तेवरों की चर्चा होती है तो फिर भोपाल संसदीय सीट का जिक्र होते ही, चर्चा में अलग मोड़ आ जाता है।

लोगों का मानना है कि आचार संहिता उल्लंघन का मामला हो या फिर चुनाव में प्रचार - प्रसार की अनुमति देने की बात हो। चुनाव आयोग ने किसी तरह का समझौता नहीं किया। आयोग ने यूपी के चार प्रमुख नेताओं पर चुनावी प्रचार- प्रसार को लेकर प्रतिबंध लगा दिया था। कुछ नेताओं ने वर्ग विशेष के वोट बंटोरने के लिए विकास कार्यों को ही वोट के आधार पर करने की बात कह डाली। इससे विवाद के हालात भी बने।

भाजपा की ओर से प्रत्याशी और बॅालीवुड की पूर्व अभिनेत्री जयाप्रदा को लेकर निजी हमले किये गये। मप्र की राजधानी, भोपाल की संसदीय सीट को लेकर भाजपा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बीच हिंदूत्व को लेकर तीखी बयानबाजी हुई। इससे सांप्रदायिक सद्भाव कम हुआ और कथित तौर पर वोट विभिन्न वर्गों में बंट गए।

चुनावी प्रचार में हिंसा

लोगों ने इस बात की आलोचना की कि, विभिन्न दौर में होने वाले चुनाव प्रचार के दौरान नेताओं में राजनीतिक सद्भाव का अभाव देखने को मिला। आरोप प्रत्यारोप की राजनीति व्यक्तिगत जीवन को लेकर की जाने वाली छींटाकशी बन गई। राजनातिक भेदभाव में नेताओं द्वारा ईश्वरचंद विद्या सागर जैसे महापुरुषों की प्रतिमा को तक निशाना बना दिया गया। आपसी मतभेद को नेताओं ने इस कदर हवा दी कि देश की एकता और अखंडता वर्गों के भेद में उलझकर टूटती नज़र आई।

प्रियंका की इमेज मेकिंग

लोगों का मानना है कि कांग्रेस अपने अध्यक्ष राहुल गांधी की कथित पप्पू छवि से बाहर निकलने का प्रयास करती रही लेकिन हर बार कांग्रेस का दांव उसके गले की हड्डी बन जाता। राफेल डील का मामला हो या फिर भ्रष्टाचार को लेकर लगाए गए अन्य आरोप कांग्रेस हर बार घिरी नज़र आई। ऐसे में कांग्रेस ने प्रियंका गांधी वाड्रा का दांव चला। प्रियंका को कांग्रेस महासचिव बनाया गया और फिर प्रियंका के नाम पर ही महागठबंधन को संगठित करने का प्रयास किया गया। यूपी में प्रियंका ने जमकर प्रचार किया और श्री काशीविश्वनाथ के दर्शन कर हिंदू वोट बैंक की सहानुभूति बंटोरी। इसके बाद मप्र में उज्जैन, इंदौर, रतलाम में रोड शो और उज्जैन के श्रीमहाकालेश्वर के दर्शन कर विभिन्न वर्गों के वोट बंटोरने का प्रयास किया गया।

सोशल मीडिया का उपयोग

17 वीं लोकसभा के लिए होने वाले चुनाव को लेकर विभिन्न दलों ने अपनी आवाज़ को फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप पर मुखर किया। युवाओं को रोजगार देने का वादा करने वाली पार्टियों ने आईटी सेल प्रारंभ कर जैसे अपने वादों को पूरा करने के लिए एक कदम बढ़ाया। लोगों का मानना रहा कि, अमुक नेता क्या कर रहा है यह जानने के लिए टेलीविजन सेट पर नज़र गड़ाने की जरुरत ही नहीं रही। लेकिन इसका एक नकारात्मक असर यह रहा कि इस माध्यम में गालियोंभरे कमेंट्स अधिक देखने को मिले और नेताओं पर व्यक्तिगत हमले किए गये। जिससे राजनीतिक क्षेत्र में गिरावट खुलकर सामने आई।