राजीव कुमार झा, कोलकाता। सीबीआई को लेकर पश्चिम बंगाल से दिल्ली तक जारी सियासी भूचाल के केंद्र में कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार का नाम इन दिनों सुर्खियों में है। बंगाल कैडर के 1989 बैच के आइपीएस अधिकारी राजीव की गिनती तेज तर्रार पुलिस अधिकारियों में होती है। आज भले ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उनके लिए धरने पर बैठी हों और यह धमकी दे रही हों कि ‘मर जाऊंगी, पर पीछे नहीं हटूंगी’, लेकिन कभी वह उनकी आंखों की किरकिरी बने हुए थे।

बात वर्ष 2011 के चुनावों से पहली की है, जब ममता बनर्जी ने तब की लेफ्ट सरकार पर फोन टेपिंग के आरोप लगाए थे। हालांकि, उन्होंने किसी भी पुलिस अधिकारी का नाम नहीं लिया था, लेकिन खबरों के मुताबिक उनके निशाने पर तब लेफ्ट के करीबी माने जाने वाले आइपीएस अधिकारी राजीव कुमार ही थे। खबरें यहां तक आईं कि जब ममता बनर्जी 2011 में सत्ता में आईं तो उन्होंने इस पुलिस अधिकारी के बारे में पूछताछ तक करवाई।

अगर तब सीनियर अधिकारी राजीव के पक्ष में न खड़े होते तो उनकी छुट्टी भी हो सकती थी, लेकिन समय बदला और साथ ही बदली तस्वीर। इसके बाद आया 2016, जब एक बार फिर बंगाल चुनावी मोड पर था। इस बार ममता की अगुआई वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार पर भाजपा व कांग्रेस हमलावर हुई। आरोप लगाया कि ममता सरकार कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार का इस्तेमाल उनके फोन टैप करवाने के लिए कर रही है।

लेफ्ट के हाथ से निकली सत्ता ममता के हाथ में आने के बाद से समय ने ऐसी करवट ली कि धीरे-धीरे ही सही, लेकिन राजीव कुमार ममता सरकार के विश्वसनीय अधिकारी बनते चले गए। विश्वास इस कदर पक्का हो गया कि जब 2500 करोड़ रुपये के सारधा चिटफंड घोटाला और करीब 17,000 करोड़ रुपये के रोज वैली स्कैम (जिसमें ममता की पार्टी के भी लिंक सामने आए हैं) उजागर हुए तो उनकी जांच का जिम्मा ममता ने उन्हीं को सौंपा। उसी मामले में अब जब सीबीआइ ने राजीव कुमार से पूछताछ करनी चाही, तो दीदी और सीबीआइ आमने- सामने आ गए।

चंदौसी के रहने वाले

राजीव कुमार मूलत: उत्तर प्रदेश के चंदौसी के रहने वाले हैं। उनके पिता आनंद कुमार चंदौसी के एसएम कॉलेज में प्रोफेसर रहे। माता-पिता चंदौसी में ही रहते हैं। राजीव कुमार ने इसी कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। बाद में आइपीएस पास कर बंगाल कैडर चुनने के बाद वह बंगाल चले आए। अभी सीबीआइ को लेकर पैदा हुए विवाद के बाद उनके पैतृक घर चंदौसी में भी हलचल है

रुड़की यूनिवर्सिटी (अब आइआइटी- रुड़की) से कंप्यूटर साइंस में स्नातक राजीव कुमार इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस में माहिर माने जाते हैं। उन्होंने कई अपराधियों को टेक्नॉलाजी की मदद से पकड़ा और इससे वह काफी सुर्खियों में भी रहे। ममता ने राजीव कुमार को 2016 में कोलकाता का पुलिस कमिश्नर नियुक्त किया था। इससे पहले जब 2011 में ममता सत्ता में आई थीं तो उन्होंने विधाननगर कमिश्नरेट बनाया, जिसका आयुक्त उन्होंने राजीव कुमार को ही बनाया था। वह अप्रैल 2013 का समय था जब बंगाल में हजारों करोड़ का बहुचर्चित सारधा चिटफंड घोटाला सामने आया था। ममता सरकार ने जांच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआइटी) गठित की थी, जिसका प्रमुख राजीव कुमार को ही बनाया गया।

राजीव कुमार की अगुआई में एसआइटी ने ही फरार चल रहे सारधा गु्रप के प्रमुख सुदीप्त सेन और उनकी सहयोगी देवयानी को कश्मीर से गिरफ्तार किया था। इसको लेकर राजीव को खूब वाहवाही मिली थी। बाद में 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआइ को इस घोटाले की जांच सौंप दी। पिछले करीब पांच वर्षों से चल रही जांच के बाद अब सीबीआइ का आरोप है कि राजीव कुमार ने सारधा से जुड़े कई अहम सुबूत सीबीआइ को नहीं दिए। उसी को लेकर यह पूरा विवाद शुरू हुआ।