कोलकाता। धरना प्रदर्शन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का हथियार रहा है। उन्होंने मोदी सरकार के खिलाफ विरोध का बिगुल फूंक रखा है। रविवार को सारधा चिटफंड घोटाले की जांच को लेकर सीबीआइ की टीम कोलकाता के पुलिस कमिश्नर से पूछताछ के लिए उनके घर पहुंच गई थी।

इसी कार्रवाई के विरोध में मुख्यमंत्री रात से ही कोलकाता में धरने पर बैठी हैं। उन्होंने अपने इस धरने को मोदी सरकार के खिलाफ सत्याग्रह बताया है। चुनावी मौसम में उनके इस तीखे तेवर ने सियासत का केंद्र बिंदु कोलकाता को और ममता को बना दिया है।

सरकार से लेकर सभी विपक्षी दलों और देशभर के लोगों का ध्यान अभी उन्हीं पर है। 64 साल की ममता के राजनीतिक जीवन पर नजर डालें तो एक छात्र नेता से मुख्यमंत्री बनने तक का सफर आंदोलन व धरने की बदौलत ही उन्होंने तय किया है।

पश्चिम बंगाल में 34 साल तक राज करने वाली वाममोर्चा सरकार से लड़ते हुए 2011 में उन्होंने वामपंथियों का सफाया कर दिया था और सत्ता पर काबिज हुईं। 2012 में प्रतिष्ठित टाइम मैगजीन ने उन्हें विश्व के 100 प्रभावशाली लोगों की सूची में स्थान दिया था।

दरअसल, ममता की छवि हमेशा से एक विरोधी व लड़ाकू नेता के तौर पर रही है। 2006 में सिंगुर में जबरन भूमि अधिग्रहण व नंदीग्राम कांड के खिलाफ बड़े पैमाने पर आंदोलन करके ममता ने देशभर के लोगों का ध्यान अपनी तरफ ध्यान खींचा और जनता के और करीब पहुंच गई।

2011 और 2016 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने प्रचंड बहुत से अपनी पार्टी तृणमूल को पश्चिम बंगाल में जीत दिलाई। ममता मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ खुलकर बोलती हैं।

इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में बतौर मंत्री उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। वहीं, 2012 में उन्होंने कांग्रेस की अगुआई वाली संप्रग सरकार से समर्थन वापस ले लिया था।

राजनीतिक सफर स्वतंत्रता सेनानी पिता की बेटी

ममता का बचपन गरीबी व संघर्ष में ही बीता। जब ममता छोटी थीं तभी उनके पिता का निधन हो गया था। 1955 में जन्मीं ममता का राजनीतिक जीवन स्कूली दिनों से ही शुरू हो गया था।

उन्होंने दक्षिण कोलकाता के जोगमाया देवी कॉलेज से इतिहास में ऑनर्स की डिग्री हासिल की। बाद में कलकत्ता विश्वविद्यालय से उन्होंने इस्लामिक इतिहास में मास्टर्स की पढ़ाई की।

श्री शिक्षायतन कॉलेज से बीएड किया और कोलकाता के ही जोगेश चंद्र चौधरी कॉलेज से उन्होंने कानून की पढ़ाई की।

सक्रिय राजनीति में ममता का सफर 1970 में शुरू हुआ जब वह कांग्रेस के छात्र परिषद से जुड़ीं। 1976 से 1980 तक वह महिला कांग्रेस की महासचिव रहीं।

1984 में ममता ने माकपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर लोकसभा सीट से हरा दिया था।

उन्होंने 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में भी जीत दर्ज की। 1991 में पहली बार ममता नरसिम्हा राव सरकार में राज्य मंत्री बनी थीं।

1996-97 में पार्टी से मतभेद होने पर ममता ने कांग्रेस पर पश्चिम बंगाल में माकपा की कठपुतली होने का आरोप लगाया और 1997 में पार्टी छोड़ने की घोषणा की।

इसके अगले ही साल एक जनवरी, 1998 को उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की। वह पार्टी अध्यक्ष बनीं और 1998 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल ने आठ सीटों पर जीत दर्ज की।

1999 में उनकी पार्टी भाजपा के नेतृत्व में बनी राजग की सरकार का हिस्सा बनी और ममता को रेल मंत्री बनाया गया। हालांकि विवाद होने पर 2001 में उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया।