नई दिल्ली। जम्मू और कश्मीर के एक पुलिस कांस्टेबल को राज्य में आतंकियों से मुकाबला करने में अदम्य साहस दिखाने पर मरणोपरांत शौर्य चक्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

बारामुला जिले के उड़ी सेक्टर के रहने वाले मंजूर अहमद नाइक ने पिछले साल पांच मार्च को दक्षिण कश्मीर के त्राल के गांव हफ्फू नगीनपोरा में आतंकियों को मार गिराते हुए अपना परम बलिदान दिया।

केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने गुरुवार को बताया कि केंद्र सरकार ने उन्हें अदम्य साहस और परम वीरता दिखाने पर मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया है।

शौर्य चक्र देश का वह सैन्य सम्मान है जो शांति काल में वीरता की अद्भुत मिसाल पेश करने, साहसिक कार्रवाई और आत्म बलिदान के लिए दिया जाता है। यह शांतिकाल में दिया जाने वाला तीसरा सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार है।

इस क्षेत्र में वीरता का सबसे बड़ा सम्मान अशोक चक्र और फिर कीर्ति चक्र है। उस दिन महज 33 वर्ष की आयु में वीरगति को प्राप्त होने वाले पुलिसकर्मी मंजूर अहमद नाइक एक घर में छिपे आतंकियों को मार गिराने की कोशिश में थे।

पहले दौर की गोलीबारी में वह आतंकी बचने में कामयाब रहे थे। लेकिन नाइक ने अपनी जान पर खेलकर आगे बढ़ते हुए अपनी राइफल से आतंकियों पर लगातार फायरिंग की। और घर के चारों ओर विस्फोटक लगा दिए। इस बीच, उन्हें भी आतंकियों की भारी गोलीबारी का सामना करना पड़ा।

लेकिन वह बड़ी चतुराई से इस हमले से बच निकले। उनके लगाए विस्फोटकों से वह घर आधे से ज्यादा गिर गया। फिर दो घंटे के इंतजार के बाद नाइक ने फिर से बचे-खुचे घर को गिराने के लिए विस्फोटक लगाने की पहल की। उसी समय आतंकियों की गोलाबारी के बीच उन्हें कई गोलियां लगीं।

लेकिन अपने जख्मों की परवाह किए बगैर कांस्टेबल नाइक ने जिस घर में आतंकी छिपे थे, उसे पूरी तरह से धराशायी करने के लिए फिर से आसपास विस्फोटक लगाए। अंतिम सांस लेने से पूर्व वह अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपने काम को अंजाम दे चुके थे।

अधिकारियों ने बताया कि पुलिस से हुई इस मुठभेड़ के बीच हिजबुल मुजाहिदीन के दो आतंकी मारे गए। मारे गए इन आतंकियों के पास से पुलिस को दो एके-47 राइफलों समेत ढेर सारे शस्त्र और असलहे मिले।

एक अन्य अधिकारी ने बताया कि नाइक ने अपनी जान और सुरक्षा की परवाह किए बगैर देश की सुरक्षा की खातिर अपने गंभीर जख्मों की भी परवाह नहीं की और अपनी आखिरी सांस तक आतंकियों से लोहा लेते रहे।