मल्टीमीडिया डेस्क। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या एक बार फिर चर्चा में है। पहले कमल हासन ने बापू के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देश का पहला हिंदू आतंकवादी करार दिया तो जवाब में भोपाल से भाजपा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा सिंह ने गोडसे का खुला पक्ष लेते हुए उसे देशभक्त करार दे दिया। गोडसे को गांधी की हत्या की सजा 15 नंवबर 1949 को ही मिल गई थी, जब उसे फांसी पर लटका दिया गया था, लेकिन गांधी की हत्या से जुड़े कई ऐसे पहलू हैं, जिन्हें कम ही लोग जानते हैं। जैसे महात्मा गांधी पर तीन गोलियां चलाने के बाद गोडसे खुद सरेंडर की मुद्रा में खड़ा हो गया था, लेकिन कोई उसके पास आने की हिम्मत नहीं जुटा सका। लोगों को लगा कि उसकी पिस्तौल में और गोलियां हैं और वो उन पर चला सकता था, लेकिन गोडसे ऐसा नहीं करने वाला था। वह दोनों हाथ ऊपर करते हुए खड़ा हो गया और खुद पुलिस-पुलिस चिल्लाने लगा था। बाद में एक शख्स को भरोसा हुआ तो वह उसके पास आया और पिस्तौल छिन ली। इसके बाद तो वहां मौजूद लोगों ने उसके पिटाई कर दी और पुलिस के हवाले कर दिया।

पुलिस के जवान गोडसे को पकड़कर दिल्ली के तुगलक रोड थाने पर लाए थे। वहां गोडसे को लॉकअप में रखा गया तो उसने मांग कि डॉक्टर को बुलाकर उसकी जांच करवाई जाए। थाने में मौजूद अफसरों ने उसकी मांग स्वीकार की और डॉक्टरों को बुलाया। जांच के दौरान गोडसे डॉक्टरों से यही पूछ रहा था कि उसकी नाडी ठीक तो चल रही है ना? डॉक्टरों ने कहा कि वह पूरी तरह स्वस्थ्य है तो उसने राहत की सांस ली।

गोडसे ने ऐसा इसलिए किया ताकि डॉक्टर उसे मानसिक रूप से बीमार या पागल करार ने दे दे। दरअसल, जैसे ही गांधी की हत्या की खबर फैली, लोगों को लगा कि किसी सिरफिरे ने ऐसा किया है। गोडसे नहीं चाहता था कि अदालत उसे पागल मानते हुए कम सजा दे।

गांधी के सबसे छोटे बेटे तो जानता था नाथूराम: पिता की हत्या की खबर मिलने के बाद महात्मा गांधी का सबसे छोटा बेटा देवदास, गोडसे से मिलने हवालात पहुंचा। देवदास को देखते हुए गोडसे उन्हें पहचान गया। देवदास को भी आश्चर्य हुआ कि गोडसे उन्हें कैसे पहचान गया, जबकि वह तो यह मानकर चल रहा थे कि गांधी का हत्यारा कोई सिरफिरा युवक है। इसी बातचीत के दौरान गोडसे ने देवदास को बताया कि दोनों की मुलाकात एक सम्मेलन में हुई थी, जहां विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों के संपादक जमा हुए थे। वहां देवदास किसी पत्रिका के संपादक के रूप में वहां आए थे, जबकि गोडसे हिंदूराष्ट्र के संपादक के रूप में वहां गया था।