मल्टीमीडिया डेस्क। पाकिस्तान हमेशा से भारत के लिए एक रिसते जख्म से ज्यादा कुछ नहीं रहा है। पाकिस्तान के अस्तित्व के विचार से लेकर उसके अस्तित्व में आने और फिर आज के हालत तक, सिवाय तबाही और विनाश के इस शब्द में कुछ नहीं रहा है।

अब बात करते हैं कि आखिर कब और कैसे पाकिस्तान का ख्याल आया और पहली बार किसके दिमाग की उपज पाकिस्तान था? पाकिस्तान को लेकर कितने प्लान बने थे और कौन थे इन योजनाओं को बनाने वाले। कुछ ऐसी ही इतिहास के आइने में झांकने वाली गर्दोगुबार में दबी परतों पर गौर करते हैं।

चौधरी रहमतअली का प्लान-

पाकिस्तान का विचार 1930 से फिजाओं को दूषित करने लगा था। सबसे पहले कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के छात्र चौधरी रहमत अली ने इसकी रूपरेखा 28 जनवरी 1933 में बनाई। रहमत अली ने पाकिस्तान का विष बीज इंग्लैंड की सरजमी पर बोया और उसकी फसल हिंदुस्तान में लहलहाई। उन्होंने अपनी पुस्तक 'Now or Never' में इस बात का खुलासा किया। जिसमें उन्होंने उत्तर- पश्चिम के मुस्लिम बहुल प्रांतों को मिलाकर पाकिस्तान बनाने की मंशा जाहिर की। 1937 में उन्होंने अपनी सोच का दायरा बढ़ाते हुए असम और बंगाल को मिलाकर बंगस्तान और दक्षिण हैदराबाद को उस्मानिस्तान बनाने की योजना शामिल कर दी।

डॉक्टर सैयद अब्दुल लतीफ का प्लान-

जनवरी 1936 में लाहौर की बैठक में मुस्लिम लीग ने हैदराबाद के डॉक्टर सैयद अब्दुल लतीफ को पाकिस्तान की पूरी योजना का कार्य सौंपा। उन्होंने पाकिस्तान के लिए चार मण्डल बनाए। पहले में सिंध, बिलोचिस्तान, कश्मीर, खैरपुर, भावलपुर। इन इलाकों से हिंदुओं और सिखों को राजा और प्रजा सहित हटाने की योजना थी। दूसरा दिल्ली और लखनऊ था, जिसमें संयुक्त प्रांत और बिहार के मुसलमान आकर रहेंगे। हिंदू यदि अपने तीर्थ स्थलों में चाहे तो रह सकते हैं। उत्तर-पूर्व मण्डल में बंगाल और आसाम को शामिल किया गया था। यहां से हिंदूओं को निकालकर बिहार में शिफ्ट करने की योजना थी। चौथे में हैदराबाद और मद्रास शामिल था वहां से भी हिंदूओं को हटने की बात शामिल थी। इसके अलावा हिंदूस्तान की मुस्लिम रियासतें जैसे भोपाल से लेकर जावरा और टोंक तक शामिल है वह भी पाकिस्तान का हिस्सा होंगी और वहां से भी हिंदूओं को हटना होगा।

मिस्टर पंजाबी की योजना-

तीसरी योजना मिस्टर पंजाबी ने अपनी बुक 'कॉन्फिडिरेसी ऑफ इंडिया' मे इंडिया को पांच भागों में बांटने की वकालत की थी। इन्डस फेडरेशन से लेकर डेक्कन फेडरेशन तक यानी बिलोचिस्तान से लेकर बस्तर और मद्रास तक का विभाजन का खाका तैयार किया गया था।

मौलवी साहब की योजना-

चौथी योजना कलकत्ते के एक मौलवी ने तैयार कि थी। जिसके मुताबिक उत्तर प्रदेश और बिहार के हिंदूओं को वहां से हटाकर पश्चिम में भेज दिया जाए और फिर अफगानिस्तान से आसाम तक और हिमालय से विन्धाचल तक पाकिस्तान बन जाए। यह देश एक खलिफा की सरपरस्ती में रहे और दक्षिण के मुसलमान उत्तर में आकर बस जाएं। इसको 'पाकिस्तान खिलाफत' योजना का नाम दिया गया।

सर सिकंदर हयात खान की योजना-

पांचवी योजना उस वक्त के पंजाब के प्रधानमंत्री सर सिकंदर हयात खान ने तैयार की थी। उन्होंने 1935 में अपनी पुस्तक ' आऊटलाइन ऑफ स्कीम ऑफ इंडियन फेडरेशन ' में भारत के सात भाग बताए और बताया कि यह योजना शासन को चलाने के लिए बनाई है, लेकिन उन्होंने पाकिस्तान की राह पर आगे बढ़ते हुए चौधरी रहमतअली की योजना में राजपूताना की जैसलमेर और बीकानेर रियासतों को शामिल कर लिया था।

सर फिरोज खां नून की योजना-

छटी योजना वायसराय की कार्यकारिणी के सदस्य और लन्दन में भारत के भूतपूर्व हाईकमिश्नर सर फिरोज खां नून ने तैयार की थी। इस योजना में पाकिस्तान का निर्माण और उसके बाद पाकिस्तान को पांच भागों मे बांटने की बात कही जिसमें पूरे भारत के मुस्लिम बहुल इलाके शामिल थे।

सैयद जफरुल हसन और मोहम्मद अफजल हुसैन कादरी की योजना-

सातवी योजना का खाका अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के सैयद जफरुल हसन और मोहम्मद अफजल हुसैन कादरी नाम के दो प्रोफेसरों ने तैयार की थी। पाकिस्तान की इस योजना में पंजाब, सिंध, सीमा प्रांत, बिलोचिस्तान, कश्मीर, कपूरथला, चित्राल, मलेरकोटला( 60 फीसद मुस्लिम आबादी), बंगाल,पुर्णिया, सिलहट( 8फीसद मुस्लिम आबादी), हैदराबाद, बरार, कर्नाटक( 8 फीसद मुस्लिम आबादी), दिल्ली, मेरठ, अलीगढ़, रुहेलखंड(28 फीसद मुस्लिम आबादी) मलाबार दक्षिण कनारा( 27 फीसद मुस्लिम आबादी) और पूर्वोत्तर पाकिस्तान को छोड़कर भारत का शेष भाग शामिल था।

चौधरी रहमत अली की 1942 की योजना-

चौधरी रहमत अली ने एक बार फिर 1942 में पाकिस्तान की नई योजना रखी और कहा कि भारत का नाम दीनिया और मुस्लिम एशिया का नाम पाकेशिया रखा जाए। उन्होने पाकिस्तान की नई योजना में अजमेर- मेवाड़ के क्षेत्र को मुईनस्तान के नाम से, लखनऊ-अवध के इलाके को हैदरस्तान, भोपाल को सिद्कीस्तान, बिहार-उड़ीसा के कुछ भागों को फर्रूकस्तान, मलाबार तट के इलाकों को मोपलास्तान, लंका के पूर्वी और पश्चिमी इलाकों को सफीस्तान और नासरस्तान के नाम से पाकिस्तान के हिस्से में सात भाग और जोड़ दिए।

डॉक्टर अाम्बेडकर ने भी पाकिस्तान के संबंध में एक किताब 'थॉट ऑफ पाकिस्तान' लिखी थी, जिसमें मुस्लिम लीग के दावे का समर्थन किया था और कहा था कि लीगी प्रांतों में 38 प्रतिशत हिंन्दू और सिख रहते हैं उनको आत्मनिर्णय का अधिकार नहीं दिया जाए, जबकि वह 25 फीसद मुसलमानों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करते थे।

इसके बावजूद मुस्लिम लीग और जिन्ना की ओर से उस वक्त तक यानी 1946 तक कोई योजना सामने नहीं आई थी।

1946, डॉ. सूर्यदेव शर्मा, ओंकारनाथ दिनकर की पुस्तक 'पाकिस्तान' से साभार