मेरठ। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बड़े क्रांतिवीरों की धरती मेरठ में चंद लमहों के बाद राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का समागम राष्ट्रोदय का आगाज होगा। आज यानी 25 फरवरी को इसके आगाज से पहले स्वयंसेवक मैदान पर ध्वनि यंत्रों के साथ रिहर्सल करने में जुटे। इसमें बच्चों से लेकर बड़े तक शामिल हैं। सभी स्वयंसेवकों के हाथ में शंख, बांसुरी, ढोल आदि हैं और इनकी थाप पर ध्वनि का रिहर्सल कर रहे हैं।

मेरठ में आज प्रशासन की ओर से व्यवस्था चाक चौबंद कर दी गई है। मुख्य गेट पर बिना पास के प्रवेश वर्जित है। सुरक्षा व्यवस्था में पुलिस बल के साथ स्वयंसेवक भी जुटे हुए है। मेरठ राष्ट्रोदय स्वंय सेवक समागम में कमिश्नर, एडीजी, आईजी डीएम सुरक्षा देखने पहुंचे।

संघ के इतिहास में नया सूर्योदय आज -

छह महीने की गहन तैयारी के बाद आज परीक्षा की घड़ी। 93 वर्ष के सफर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए आज मेरठ में नया सूर्योदय होगा। आज राष्ट्रोदय के भव्य मंच से यहां से राष्ट्रवैभव का संदेश देने का मुहूर्त आ गया है। संघ के महासमागम पर पूरी दुनिया की नजर है। एक साथ एक ड्रेस में एक मैदान पर तीन लाख लोगों की रिकॉर्ड संख्या को गिनीज बुक आफ वल्र्ड रिकार्ड भी नया अध्याय मान रहा है। सर संघचालक मोहन भागवत स्वयंसेवकों की शारीरिक दक्षता देखने के बाद उन्हें मंच से करीब 50 मिनट तक संबोधित करेंगे। होली से पहले पूरा शहर भगवा रंग में काफी सराबोर हो गया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विकास यात्रा में पश्चिमी उप्र महत्वपूर्ण पड़ाव है। यहां पंजाब के कार्यकर्ताओं ने पहली शाखा 1933 में मोदीनगर में लगाई। इसके बाद में मेरठ संघ की विचारधारा का शक्ति केंद्र बन गया। यहां पर सावरकर, भाऊराव देवरस और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे संघ के कद्दावरों का आना-जाना बना रहा। विचारधारा के इस प्रवाह में 1949 में शंकर आश्रम भी एक केंद्र बन गया।

उस दौर में देश में आजादी की छटपटाहट थी। भारतीय समाज जाति, धर्म, क्षेत्र एवं भाषागत संकीर्णताओं में फंसा हुआ था। अंग्रेजों ने भारत की संपन्न विरासत को न सिर्फ नुकसान पहुंचाया था, बल्कि वो जातियों के बीच नफरत पनपाते रहे। ऐसे में संघ ने राष्ट्रभावना विस्तार को राष्ट्रनिर्माण की बुनियादी जरुरत माना। मेरठ में 1937 में ब्रह्मपुरी के पीछे एक खेत में संघ कार्यकर्ता जुटने लगे। 1939 में गिरधारी लाल शास्त्री मेरठ में प्रचारक बनकर पहुंचे।

यहां बेगमपुल स्थित जगदीश शरण विद्यालय में उन्होंने शाखा लगाई। इससे पहले यहां पर सावरकर, भाऊराव देवरस और बाबूराव मोघे आए, जिसके बाद मेरठ में संघ की शाखा में नई स्फूर्ति जाग पड़ी। इसी स्फूर्ति को गिरधारी लाल शास्त्री ने अपनी ताकत बनाई। उन्होंने मेरठ से आगे मवाना व बिजनौर तक शाखाओं का प्रचार किया। 1942 में सुभाष बाजार में डीएवी कालेज के सामने राहुल प्रसाद संस के घर पर संघ का कार्यालय खोला।

दीनदयाल जी ने खुद की कार्यालय की सफाई -

मेरठ में 1946 में कुछ दिन तक कार्यालय लालकुर्ती में भी बना रहा। यहां पर तत्कालीन सह प्रांत प्रचारक दीनदयाल उपाध्याय पहुंचे। बताते हैं कि कार्यालय पर बेहद गंदगी थी। उन्होंने अकेले ही सफाई कर दी। इससे स्वयंसेवक काफी प्रेरित हुए और सभी ने स्वच्छता को धर्म के रूप में आत्मसात किया। इसके बाद 1947 में विजयनगर में संघ का कार्यालय खुला। इसी बीच महात्मा गांधी की हत्या के बाद चार फरवरी 1948 को संघ पर प्रतिबंध लगा। इसके बाद फिर 12 जुलाई 1949 संघ से प्रतिबंध हटा लिया गया।

इसी बीच शंकरलाल-पत्थरवाले सेठ ने संघ को जमीन दान दी। वर्तमान शंकर आश्रम उन्हीं के नाम पर इसी वर्ष अस्तित्व में आ गया। पश्चिमी उप्र के तमाम क्षेत्रों में संघ की शाखाओं ने लोगों के बीच संवाद और भरोसा बढ़ाया। कई प्रबुद्ध लोगों के संघ से जुडऩे पर सामाजिक हलचल भी बढ़ी, किंतु स्वयंसेवक अपनी धुन में चलते रहे। इसके बाद 60 के दशक तक संघ की शाखाएं बढ़ती गईं। इसी बीच मथुरा के दीनदयाल उपाध्याय संघ में तेजी से उभरकर सामने आए।

दीनदयाल उपाध्याय ने रक्षाबंधन के अवसर पर 1967 में टाउनहाल में एक कार्यक्रम को संबोधित किया। दो हजार से ज्यादा स्वयंसेवकों का जमावड़ा शहर में चर्चा का विषय बना। इससे पूर्व दीनदयाल का बौद्धिक हापुड़ में हुआ था, जो काफी चर्चित रहा। उनका एकात्म मानववाद दुनिया में मंथन का विषय बना। उनके मेरठ में रहने वाले ममेरे भाई विजय मुद्गल बताते हैं कि पंडित दीन दयाल बेहद सरल और सामान्य जीवनशैली के व्यक्ति थे। उन्होंने हंसते हुए जिक्र किया है कि पंडितजी ने एक प्रश्न किया कि अगर....मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिस्तानी, सर पर लाल टोपी हो गई तो फिर दिल हिंदुस्तानी कहां रह गया। यह गाना उन दिनों काफी हिट रहा था।

दीनदयाल उपाध्याय की 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय में हत्या की खबर से संघ परिवार की नब्ज बैठ गई। चंद दिनों बाद 13 से 15 फरवरी तक मेरठ प्रांत के गुलावठी में संघ का शिविर लगा, जिसमें अटल बिहारी बाजपेयी पहुंचे थे। बताते हैं कि वह पंडितजी के निधन से इतने स्तब्ध हुए कि तीन घंटे तक एक शब्द नहीं बोला। गुरु गोलवरकर ने स्वयंसेवकों को संबोधित किया। उन्हें संघ परिवार के लक्ष्य की ओर नई उम्मीद और साहस के साथ बढऩे की प्रेरणा दी। 1971 को भैंसाली मैदान में गुरु गोलवरकर ने स्वयंसेवकों को संबोधित किया। इसमें तीन हजार से ज्यादा स्वयंसेवकों ने भाग लिया था।

इसी बीच 1975 में तत्कालीन इंदिरा सरकार ने देश में इमरजेंसी लगा दी। बड़े पैमाने पर स्वयंसेवकों को पकड़कर जेल भेजा गया। स्वयंसेवक प्रदीप गर्ग ने इमरजेंसी का विरोध करते हुए मेरठ कालेज में पटाखा फोड़कर छात्रों को एकत्रित किया। संघ के विचारक बताते हैं कि प्रदीप का थाना लालकुर्ती में घोर उत्पीडऩ किया गया। बेहद सर्द रात में उन्हें कोड़ों एवं लाठियों से पीटा गया, किंतु उन्होंने संघ के किसी पदाधिकारी का पता नहीं बताया। इमरजेंसी में पुलिस के दमन से बचने के लिए तत्कालीन विभाग प्रचारक ने नाम बदलकर केडी बाबू रख लिया। 1989 में डा. हेडगेवार की जन्म शताब्दी पर देशभर में तमाम कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसमें मेरठ में भी नर सेवा, नारायण सेवा का सूत्रवाक्य दिया गया।

माधवकुंज में पढ़ते हैं पूर्वोत्तर के गरीब छात्र -

शताब्दीनगर में 2000 में माधवकुंज बनाया गया, जहां पूर्वोत्तर के गरीब छात्रों को पढ़ाया जाता है। यहां पर संघ के भी तमाम सांस्कृतिक एवं विविध आयोजन होते हैं। उत्तर प्रदेश को संघ ने दो भागों में बांटा, जिसमें पूर्वांचल, अवध व बुंदेलखंड का केंद्र लखनऊ, जबकि पश्चिमी यूपी और उत्तराखंड का केंद्र मेरठ में शंकर आश्रम बना। सभी संघ प्रमुखों ने यहां का प्रवास किया। संघचालक मोहन भागवत भी दो वर्ष पहले मेरठ में आए और करीब एक घंटे का संबोधन किया।