वाराणसी। आजादी के बाद भारत में जनभाषा हिंदी को वह स्थान नहीं मिल सका जो अंग्रेजी शासन के दौरान महामना पं. मदन मोहन मालवीय ने उसे दिलाया था। उन्होंने अंग्रेजी शासन में अंग्रेज न्यायाधीश के समक्ष हिंदी का पक्ष अंग्रेजी भाषा में रखा। मसला था हिंदी को कार्यालयीय और अदालती भाषा बनाने का।

महामना के प्रयास के पहले देश में कोई भी सरकारी पत्र हिंदी में नहीं लिखा जाता था। पत्र सिर्फ अंग्रेजी में ही स्वीकार होते और उनपर कार्रवाई होती। अदालत व सरकारी कार्यालयों में अंग्रेजी किले को ढहाने के लिए महामना ने 15 अप्रैल सन 1919 में इलाहाबाद के न्यायालय में हिंदी को कार्यालयीय एवं अदालती भाषा बनाने के लिए जमकर कड़ी बहस की।

इसी की याद में दक्षिण भारत के कुछ संस्थान प्रतिवर्ष 15 अप्रैल को प्रयोजन मूलक हिंदी दिवस मनाते हैं। उनका मानना है कि महामना ने हिंदी को रोजगारपरक भाषा बनाया है। सरकारी कार्यालयों में हिंदी में पत्र लिखने पर लोगों के काम हो जाने लगे। इसके लिए हिंदी के जानकार बेरोजगारों को हिंदी टाइपिंग व इसके जवाब से संबंधित पद का सृजन होने लगा। उनकी पहल के बाद कार्यालयों में हिंदी अधिकारी नियुक्त होने लगे।

काली पोशाक पहनने से कर दिया था इंकार

इस बहस की खास बात यह थी कि महामना ने अदालत में श्वेत वस्त्र धारण किया था। उन्होंने अदालत की काली पोशाक पहनने से मना कर दिया था। उनकी बहस से अंग्रेजी न्यायाधीश बहुत प्रभावित हुए और देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को सरकारी कार्यालय एवं अदालत की भाषा के रूप में स्वीकृति दे दी।

हिंदी के प्रति महामना की संवदेनशीलता और संघर्ष के बाद भी आजाद भारत में आज हिंदी जस की तस पड़ी हुई है। उनके बाद कोई दूसरा महामना नहीं हुआ जो हिंदी को देश में बाध्यकारी भाषा बना दे।