नई दिल्ली। भारतीय लोगों को इस समय सुअर पालन के बिजनेस से काफी मोटी कमाई करने का सुनहरा मौका है। दरअसल, चीन के सुअर पालन उद्योग तेजी से गिर रहा है, जबकि वहां सुअर के गोश्त की मांग लगातार बनी हुई है। अफ्रीकी स्वाइन बुखार (एएसएफ) के प्रसार को रोकने के लिए चीनी अधिकारी संघर्ष कर रहे हैं। इस महामारी की वजह से चीन में बीते दो सालों में करीब 1.4 अरब सुअरों को मार डाला गया है।

दुनिया के सबसे बड़े पोर्क उत्पादक और उपभोक्ता देश में बड़े पैमाने पर होने वाली सुअरों की मौत के नतीजतन इनकी कीमतों में बढ़ोतरी की उम्मीद है, जो साल 2019 में रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ सकती है। हालांकि, भारत में अभी तक अफ्रीकी स्वाइन फ्लू की दस्तक नहीं हुई है। यह बीमारी अफ्रीका से लेकर यूरोप और रूस तक फैल गई है, इसने वियतनाम और कंबोडिया जैसे एशियाई देशों में भी अपनी पैठ बना ली है।

यह भारतीय सुअर पालकों के लिए अच्छी खबर हो सकती है और शायद अभी इस इस उद्योग के लिए एक बूस्टर हो सकता है। बताते चलें कि भारत में दुनिया की सुअर आबादी का मात्र 1.05 फीसद है। फिर भी भारत में सुअरों की पांचवीं सबसे बड़ी आबादी है। गौरतलब है कि चीनी चंद्र कैलेंडर के अनुसार यह पिग ईयर (सुअर का वर्ष) है। एएसएफ बीमारी मनुष्यों के लिए हानिकारक नहीं होने के बावजूद करीब 20 करोड़ सुअरों को बीमारी होने या एहतियात के तौर पर मारा जा सकता है। इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है और न ही इसकी कोई वैक्सीन अभी बाजार है।

पिछले अगस्त में एएसएफ के प्रकोप के बाद से चीन में सुअर के मांस की कीमतों में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। इस साल फरवरी और अप्रैल के बीच जीवित सुअरों की कीमतें प्रति किलोग्राम 121 रुपए से बढ़कर 158 रुपए प्रति किलोग्राम हो गई हैं। माना जा रहा है कि इस साल इसकी कीमत 214 रुपए प्रति किलो तक पहुंच सकती है, जो साल 2016 में इस रिकॉर्ड स्तर को छू चुकी हैं।

चीनी सरकार सुअरों की बढ़ती कीमतों को लेकर चिंतित है। अधिकारियों को डर है कि यह सार्वजनिक असंतोष को जन्म दे सकता है। वास्तव में, अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के कारण पिछले साल अमेरिकी पोर्क उत्पादों पर लगाए गए 62 फीसद टैरिफ के बावजूद साल 2019 में अमेरिकी पोर्क का आयात 2017 में निर्यात की गई मात्रा से अधिक हो गया है। साल 2017 में एक लाख 70 हजार टन सुअर के मांस का आयात किया गया था, जिसके इस साल बढ़कर तीन लाख टन को छूने की उम्मीद है।