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    आयकर रिटर्न और पैन के लिए आधार की अनिवार्यता पर आंशिक रोक

    Published: Fri, 09 Jun 2017 02:30 PM (IST) | Updated: Fri, 09 Jun 2017 07:50 PM (IST)
    By: Editorial Team
    aadhar pan link 09 06 2017

    नई दिल्ली। आयकर रिटर्न दाखिल करने और पैन (स्थायी खाता संख्या) आवंटन के लिए आधार को अनिवार्य बनाने संबंधी कानून की वैधता को सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बरकरार रखा। लेकिन, संविधान पीठ के इससे जुड़े निजता के अधिकार (संविधान के अनुच्छेद 21) मामले का निपटारा किए जाने तक अदालत ने इसके कार्यान्वयन पर आंशिक रोक (स्टे) भी लगा दी।

    सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर यह होगा कि जिन लोगों के पास आधार कार्ड हैं उन्हें इसे पैन के साथ अनिवार्य रूप से लिंक करना होगा। लेकिन, जिन लोगों ने आधार के लिए नामांकन करा लिया है और आधार कार्ड प्राप्त नहीं हुआ है, उन्हें इस प्रावधान से छूट प्रदान की गई है। लिहाजा दंड के तौर पर उनके पैन को अवैध करार नहीं दिया सकेगा। आयकर अधिनियम की धारा 139एए के तहत एक जुलाई, 2017 से आयकर रिटर्न दाखिल करने और पैन आवंटन के आवेदन में आधार या आधार आवेदन की नामांकन संख्या का उल्लेख करना अनिवार्य है। इस धारा को इस साल पेश बजट और वित्त विधेयक, 2017 के माध्यम से अधिनियम में जोड़ा गया था।

    जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण की पीठ ने इस कानून को बनाने की संसद की विधायी क्षमता को स्वीकार करते हुए कहा कि आयकर अधिनियम के इस प्रावधान और आधार अधिनियम में कोई टकराव नहीं है। पीठ ने कहा कि नए कानून पर आंशिक रोक से पुराने लेन-देन न तो प्रभावित होंगे और न ही अमान्य होंगे। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने निजता के अधिकार और आधार योजना से मानव गरिमा प्रभावित होने संबंधी अन्य पहलुओं पर विचार नहीं किया है, क्योंकि इस पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ को फैसला करना है। हालांकि, अदालत ने सरकार से यह सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम उठाने को कहा कि आधार योजना से आंकड़े किसी भी तरह लीक न हों, क्योंकि ऐसी संभावना व्यक्त की गई है कि आंकड़ों का दुरुपयोग किया जा सकता है।

    दरअसल, भाकपा नेता बिनोय विस्वाम ने सरकार के इस कदम का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। उनका कहना था कि सरकार शीर्ष अदालत के 2015 के आदेश को कमतर साबित नहीं कर सकती जिसमें अदालत ने विशिष्ट पहचान संख्या को स्वैच्छिक करार दिया था। इसके अलावा उनका यह भी कहना था कि सरकार को आयकर अधिनियम में यह धारा नहीं जोड़नी चाहिए थी।

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