नई दिल्ली। मौलाना मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के प्रस्ताव का जिस तरह चीन ने विरोध किया है उससे भारत में चीन के खिलाफ एक बड़ा माहौल बनता दिख रहा है। आम नागरिकों के मन में तो चीन के इस रवैये के खिलाफ गुस्सा है ही, फिल्म उद्योग से लेकर उद्योग जगत की ओर से भी चीन के बाजार और उसके उत्पादों का बहिष्कार करने की बातें सामने आने लगी हैं।

सोशल मीडिया पर भी चीनी उत्पादों के विरोध की जबर्दस्त चर्चा है। भारत में ट्विटर पर गुरुवार को दिनभर 'बायकॉट चाइनीज प्रोडक्ट' का हैशटैग ट्रेंड करता रहा। केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने भी इस तरह के विरोध का समर्थन किया है।

उन्होंने कहा, 'अब समय आ गया है कि हम चीन को यह कड़ा संदेश दें कि वह उन आतंकियों की मदद कर रहा है जो हमारे सैनिकों की हत्या कर रहे हैं। सभी भारतीयों को इस बारे में मन बना लेना चाहिए। हम होली के बाद से चीन में बने किसी भी उत्पाद को हाथ नहीं लगाएंगे।'

दरअसल, बादल का यह बयान तब आया है जब देश में छोटे खुदरा कारोबारियों के सबसे बड़े संगठन कंफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने देशभर के व्यापारियों से चीन निर्मित उत्पादों का बहिष्कार करने का आह्वान किया है। कैट ने घोषणा की है कि 19 मार्च को देशभर में हजारों स्थानों पर चीनी उत्पादों की होली जलाई जाएगी।

बाबा रामदेव ने भी ट्विटर पर अपने उद्गार व्यक्त किए हैं। उन्होंने कहा, 'चीन विशुद्ध रूप से व्यवसायिक भाषा ही समझता है। आर्थिक बहिष्कार युद्ध से भी ज्यादा ताकतवर है।' चीन के प्रति यह गुस्सा बुद्धिजीवी वर्ग में भी दिखाई दे रहा है।

रणनीतिक विशेषज्ञ ब्रह्माा चेलानी का कहना है, 'चीन ने मसूद अजहर पर प्रतिबंध का क्यों विरोध किया है, इसे समझने की जरूरत है। चीन अंतिम समय गिन रहे आतंकी को ही नहीं बचा रहा है बल्कि वह पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय दबाव से भी बचा रहा है कि वह आतंकियों के खिलाफ कोई बड़ी निर्णायक कार्रवाई न करे।'

प्रख्यात फिल्मकार हंसल मेहता ने ट्वीट कर पूरे फिल्म उद्योग से सवाल किया कि क्या हम चीन में अपनी फिल्मों को रिलीज नहीं करने का फैसला कर सकते हैं। सनद रहे कि हाल के वर्षों में भारतीय फिल्म निर्माताओं के लिए चीन एक बड़ा बाजार बनकर उभरा है। 2016 में चीन में दो भारतीय फिल्मों का प्रदर्शन हुआ था। जबकि 2018 में 10 भारतीय फिल्मों को वहां रिलीज किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, आमिर खान की फिल्म दंगल ने वहां एक हजार करोड़ रुपये का कारोबार किया है।

संभव नहीं चीनी उत्पादों पर संपूर्ण प्रतिबंध

भारत और चीन के आर्थिक रिश्ते आज जिस मुकाम पर पहुंच चुके हैं उसे देखते फिलहाल यह संभव नहीं दिखता कि चीन में बने उत्पादों को भारत में पूरी तरह प्रतिबंधित किया जा सके। आज की तारीख में देश के 60 फीसद से ज्यादा मोबाइल हैंडसेट बाजार पर चीन की कंपनियों का कब्जा है।

2014 में घरेलू हैंडसेट बाजार में भारतीय कंपनियों की हिस्सेदारी 50 फीसद थी जो 2018 में घटकर नौ फीसद ही रह गई है। शिओमी, ओप्पो, वीवो, लेनेवो, हुवेई जैसी कंपनियां भारतीय मोबाइल बाजार में छा चुकी हैं। सिर्फ संचार क्षेत्र में ही नहीं, चीन की कंपनियों का दबदबा ढांचागत क्षेत्र में भी तेजी से बढ़ता जा रहा है।

शंघाई इलेक्ट्रिक, एसेल अहमदाबाद गोधरा रोड्स लिमिटेड, सिनो हाइड्रो कार्पोरेशन, शीइंडिया स्टील लिमिटेड, शौगैंग इंटरनेशनल, जेटीई, हार्बिन इलेक्ट्रिक, साइनो स्टील जैसी दर्जनों कंपनियां स्टील से लेकर बिजली और सड़क निर्माण से लेकर कंप्यूटर निर्माण तक में जुटी हुई हैं। 2017-18 में भारत के साथ व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में 58 अरब डॉलर का था। इस वर्ष चीन ने भारत के कृषि और दवा उत्पादों के लिए अपना बाजार खोला है, लेकिन इसका असर अभी नहीं दिखाई दिया है।