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डेली यूज़ की इन चीज़ों का ये होता है फंडा, आपने सोचा भी नहीं होगा

   |  Thu, 25 Jan 2018 05:00 PM (IST)

रोज़मर्रा के जीवन में हम जिन चीज़ों का उपयोग करते हैं उन्‍हें लेकर हमारे मन में अक्‍सर सवाल उठते होंगे कि आखिर इनकी बनावट ऐसी क्‍यों है या इनके नाम या आकार का इनके इस्‍तेमाल से संबंध क्‍यों नहीं है। लेकिन इनके भी कुछ कारण होते हैं। आइये हम ऐसे ही कुछ उदाहरण देखते हैं।

कम्‍प्‍यूटर के की बोर्ड पर लैटर्स अल्‍फाबेटिक आर्डर में क्‍यों नहीं होते। केवल ओरिजनल टाइपराइटर पर ही होते हैं। की लैटर्स को एक दूसरे से दूर जमाकर रखने से टाइपिंग करना आसान होता है इसलिए इन्‍हें क्रम में नहीं रखा जाता।

कोहनी पर कपड़े की एक्‍स्‍ट्रा परत का मूल विचार सेना से आया था। सैनिकों को कोहनी के बल घिसटकर मोर्चे में आगे बढ़ना होता है। पचास के दशक के बाद अमेरिकी स्‍टूडेंट्स ने यह विचार फैशन ट्रेंड में स्‍थापित किया। तभी से यह चीज़ कपड़ों में भी नज़र आने लगी।

आइसक्रीम हमेशा कोन में ही क्‍यों बेची जाती है, इसका जवाब ये है कि 19 वीं सदी के अंत में आइसक्रीम गिलास में रखकर खाई जाती थी। एक ही गिलास में दी जाती थी इसलिए हर बार ग्राहक को गिलास धोकर देना होता था। इसलिए कोन की ईजाद की गई।

कैमरा और आईफोन के पीछे यह जो छोटा सा काला डॉट बना हुआ होता है इसका उपयोग आवाज़ को कंट्रोल करने का होता है। अक्‍सर यूजर्स ऐसी जगहों पर बात करते हैं जहां अधिक शोरगुल होता है, ऐसे में यह बैकग्राउंड आवाज़ को दबाकर आपकी आवाज को उभारने में मदद करता है।

स्‍नीकर्स में यह जो एक्‍स्‍ट्रा होल होते हैं इनका क्‍या अर्थ हो सकता है। ये छेद हवा को भीतर ले जाने में मदद करते हैं ताकि पैरों को हवा मिलती रहे और पहनने वाले को पसीने से निजात मिल सके।

कुछ लोगों के शर्ट पर पीछे की ओर एक छोटा सा लूप होता है। इसकी शुरुआत टाई के कारण हुई। पहले शर्ट के साथ टाई पहनना होती थी। इसके पीछे इसी तरह का लूप इसलिए दिया जाने लगा कि उसे टांगा जा सके।

गुल्‍लक जिसे पिगी बैंक कह जाता है, उसका आकार पिग जैसा होता है। यह शब्‍द प्‍येग नाम के क्‍ले मॉडल से आया है। इस तरह के जार अब नज़र नहीं आते लेकिन शब्‍द अभी भी क़ायम है। प्‍येग से शब्‍द पिग हो गया। लोगों ने पिग के स्‍वरूप के जैसे गुल्‍लक बनाना शुरू कर दिये।

सुपरमार्केट में खाने-पीने की वस्‍तुओं के पैकेट में रंगीन धब्‍बे या चिन्‍ह बने होते हैं। इनका अर्थ ये होता है कि सामग्री के प्रोडक्‍शन व पैकिंग के दौरान खाने के साथ अंदर और कुछ न चला जाए इसलिए रंगीन प्रिंट किया जाता है। इससे पता चलता है कि पैकिंग पर कहां तक स्‍याही छापी गई है, वहां तक सामग्री भीतर भरी है।

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