अनिल मिश्रा, रायपुर। बीजापुर जिले का पामेड़ थाना पहली बार सड़क मार्ग से जुड़ने जा रहा है। यह ऐसा इलाका है जहां दस किलोमीटर सड़क बनाने के लिए डेढ़ हजार जवानों को तैनात करना पड़ा है।

बीजापुर से पामेड़ के लिए सीधे सड़क नहीं है। जिले के बासागुड़ा थाने से पामेड़ की दूरी 55 किमी है। बासागुड़ा तक सड़क बना ली गई लेकिन इसके आगे जंगल में नक्सलियों का कब्जा है। पामेड़ तेलंगाना की सीमा से सटा हुआ है। तेलंगाना की ओर से सड़क बनाई जा रही है ताकि पामेड़ तक पहुंचने का कोई तो रास्ता हो। हालांकि इस रास्ते से बीजापुर से पामेड़ जाने के लिए दंतेवाड़ा, सुकमा जिलों से घूमकर करीब चार सौ किमी का लंबा चक्कर काटना पड़ेगा।

इसके बावजूद 10 किमी की यह सड़क बेहद अहम इसलिए है क्योंकि अब तक पामेड़ थाने तक रसद की सप्लाई भी हेलीकॉप्टर से ही हो पाती थी। अब तेलंगाना के रास्ते यह कस्बा दुनिया से जुड़ जाएगा। बीजापुर से सीधे सड़क बनाना तो असंभव है ही, तेलंगाना के रास्ते भी सड़क पहुंचाना आसान नहीं था। साल भर से सड़क का काम चल रहा है।

सुरक्षा में लगे एक जवान की नक्सली हत्या कर चुके हैं। कई बार हमले हुए। तब जाकर मिट्टी का काम पूरा हुआ। मार्ग में दो नाले हैं जिन पर पुल बनाया जा रहा है। सड़क बनाने के लिए दस किमी के दायरे में सीआरपीएफ के दौ कैंप खोले गए। अब डामरीकरण की तैयारी की जा रही है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इस साल बरसात के बाद सड़क काम पूरा हो जाएगा।

नक्सलियों का अंतरराज्यीय कॉरीडोर

पामेड़ ऐसी जगह स्थित है जहां से नक्सलियों का अंतरराज्यीय कॉरीडोर है। यह बस्ती शुरू से तेलंगाना पर निर्भर रही। यहां थाना है लेकिन जवानों को एक तरह से खुली जेल में रहना पड़ता है। चारों तरफ नक्सली हैं। पामेड़ के सरपंच रमेश ने बताया कि थाने में सीआरपीएफ की कंपनी लगाई गई तो नक्सलियों ने पामेड़ का साप्ताहिक बाजार बंद करा दिया।

अब वे पामेड़ से 15 किमी दूर जंगल में बाजार लगवाते हैं। पामेड़ तक सड़क बनी तो एक और नक्सली किला ढह जाएगा। तेलंगाना के तिम्मापुर के रास्ते आठ किमी मार्ग ऐसा था जिसपर ट्रैक्टर या बाइक से चलना भी मुश्किल था। अब मिट्टी की सड़क बन चुकी है। दो नालों पर पुल बनते ही इस सड़क पर गाड़ियां दौड़ने लगेंगी।

कई बार हो चुका है हमला

पामेड़ से तेलंगाना के इसी रास्ते पर 2007 में नक्सलियों ने जवानों की एक टुकड़ी को तब एंबुश में फंसा लिया था जब वे तिम्मापुर से पामेड़ जा रहे थे। इस घटना में नौ जवान शहीद हुए थे। इस घटना के कुछ दिन बाद नक्सलियों ने घात लगाकर दो जवानों की हत्या कर दी थी। 2016 में इस सड़क के निर्माण के दौरान सुरक्षा ड्यूटी पर निकले जवानों पर नक्सलियों ने हमला किया जिसमें एक जवान की मौत हो गई।

ठेकेदारों ने खड़े कर दिए थे हाथ

पामेड़ तक सड़क बनाना आसान नहीं था। 10 किमी सड़क के लिए नौ करोड़ का बजट है लेकिन ठेकेदार काम करने को तैयार ही नहीं हो रहे थे। नक्सलियों ने सड़क बनाने वाले को जान से मारने का एलान कर रखा था। नक्सली विरोध के चलते सिर्फ पामेड़ थाना ही नहीं 1376 की आबादी वाला पामेड़ गांव भी दुनिया से कटा रहा। फोर्स ने सुरक्षा की पूरी गारंटी दी तब जाकर सड़क काम काम शुरू हुआ।