मल्टीमीडिया डेस्क। 23 दिसंबर 1912 को वायसराय लॉर्ड हार्डिंग के जुलूस पर चांदनी चौक में बम फेंका गया। हालांकि, हार्डिंग उसमें बाल-बाल बचा। इस बमकांड में बसंत कुमार विश्वास के अलावा भाई बालमुकुंद का सक्रिय सहयोग था। भाई बालमुकुंद को इस बात का बड़ा दु:ख रहा कि बाइसराय बच गया। इसलिए उन्होंने अपनी पत्नी को भाई परमानंद के घरवालों के पास छोड़ा और स्वयं जोधपुर के राजकुमारों के ट्यूटर बन गए। योजना यह थी कि लॉर्ड हार्डिंग यहाँ कभी-कभी आयेगा और वह नजदीक से उन पर बम फेंक कर अधूरा काम पूरा करेंगे।

मगर, 8 मई 1915 को मास्टर अमीर चंद, भाई बालमुकुंद, मास्टर अवध बिहारी को यहां फांसी दी गई। पुरानी दिल्ली में बहादुरशाह जफर रोड पर दिल्ली गेट से आगे स्थित वर्तमान खूनी दरवाजे के पास जिस जेल में दिल्ली बम कांड के इन शहीदों को फांसी दी गयी थी, उसके निशान भी मिटा दिए गए। अब वहां जेल की जगह मौलाना आजाद मेडिकल कालेज बन गया है। अगले दिन 9 मई को अंबाला में वसंत कुमार विश्वास को फांसी दी गई।

यद्यपि भाई बालमुकुंद पर जुर्म साबित नहीं हुआ था, फिर भी शक के आधार पर अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें सजा दी। भाई बालमुकुंद का विवाह फांसी दिए जाने से एक साल पहले ही हुआ था। आजादी की लड़ाई में जुटे होने के कारण वे कुछ समय ही पत्नी के साथ रह सके। उनकी पत्नी का नाम रामरखी था। उनकी इच्छा थी कि भाई बालमुकुंद का शव उन्हें सौंप दिया जाए, लेकिन अंग्रेज हुकूमत ने उन्हें शव नहीं दिया। उसी दिन से रामरखी ने भोजन व पानी त्याग दिया और अठारहवें दिन उनकी भी मृत्यु हो गई।

इसलिए मिली थी भाई की उपाधि

भाई बालमुकुंद के खानदान में अपने सिद्धांतों पर मर मिटने की प्रथा बड़ी पुरानी थी। गुरु नानक के अनुयायी पहले शांति के पुजारी थे। मगर, जब मुगलों ने उन्हें दबाना चाहा, तो ये ही शांतिप्रिय शिष्य तलवार उठाने पर विवश हुए। इस परिवर्तन के पीछे भाई बालमुकुंद के पूर्वपुरुषों का बहुत बड़ा‌ योग था। इसी कुल में मतिदास हुए, जो गुरु तेग बहादुर के साथ शहीद हुए। उन्हें लकड़ी के दोशहतीरों के के बीच रखकर आरी से चीरा गया। इस बलिदान के कारण गुरु गोविंद सिंह ने इस कुल के लोगों को भाई की उपाधि दी थी। इसी त्याग-तपस्या से उज्ज्वल कुल में भाई बालमुकुंद का जन्म हुआ था।