रामकृष्ण मुले, इंदौर। दाऊदी बोहरा समाज की देश-दुनिया में एक खास पहचान है। इसका श्रेय उनकी एकजुटता और धर्मगुरु को दिया जाए तो गलत नहीं होगा। धर्मगुरु का कहना है कि व्यापार का कोई पार नहीं। व्यक्ति दिन दुगनी, रात चौगुनी तरक्की करता है। उनकी इस हिदायत पर चलकर समाजजन ने विकास का एक लंबा सफर तय किया है। समाज ने मौला की सीख भरोसा, पाबंदी और नेकनीयत पर चलकर कामयाबी हासिल की। नौकरी के बजाय व्यापार की हिदायत पर चलकर आज समाज का 85 फीसदी वर्ग छोटा, मध्यम और बड़ा व्यापार कर रहा है।

देश के विकास में बोहरा समाज का एक बड़ा योगदान है। सैयदना की हिदायत के साथ इसका एक बड़ा कारण आपसी समन्वय है। व्यापार के लिए बिना ब्याज की रकम उपलब्ध कराई जाती है। आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग कमजोर तबके को आगे लाने के लिए हरसंभव मदद करता है। आर्थिक असमानता दूर करने के लिए भी कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इनका लाभ लेकर समाज का हर तबका आगे बढ़ रहा है।

मिलता है अनुशासन का फायदा

बोहरा समाज का पसंदीदा व्यापार लोहा, फर्नीचर, ऑइलपेंट और हार्डवेयर है। होम डेकोरेशन, एल्युमिनियम व कांच के व्यापार में भी पकड़ मजबूत है। शहर में जवाहर मार्ग, बोहरा बाजार, सियागंज के व्यापारियों में एक बड़ा हिस्सा बोहरा समाज का भी है। समाज की अनुशासन प्रियता और विश्वसनीयता का लाभ भी व्यापारियों को मिलता है। बिना ब्याज के पैसा मिलने से व्यवसाय का जोखिम भी घट जाता है। भरोसा, अनुशासन और जोखिम में कमी व्यवसाय में तरक्की का एक बड़ा कारण समाजजन मानते हैं।

अंग्रेजी शिक्षा के साथ दीनी तालीम भी जरूरी

बोहरा समाज का अंग्रेजी शिक्षा को लेकर को बैर नहीं है लेकिन दीनी तालीम भी जरूरी है। बच्चे किसी भी स्कूल में जाएं लेकिन मदरसा भी जाना होता है। बच्चों को मजहब की जानकारी देने के लिए मदरसे का संचालन तीन समय किया जाता है। माता-पिता उनकी सुविधा के अनुसार उसे भेजते हैं, जहां उसे पैगम्बर, इमाम, धर्मगुरु के साथ इस्लाम की जानकारी दी जाती है और उर्दू सिखाई जाती है। माता-पिता भी समाज के आयोजनों में बच्चों को ले जाते हैं ताकि वे अपने धर्म को व्यापक रूप से जान सके। मस्जिद जाने के अलावा ईद की नमाज, धर्मगुरु की वाअज के आयोजन भी इसमें शामिल हैं।

धनतेरस पर बही खाते पर लिखते हैं बिस्मिल्लाह

सैयदना का फरमान है- सबसे मिलजुलकर रहो, किसी से बैर मत रखो। इसके चलते समाजजन जिन देशों में रहते हैं, वहां के कायदे-कानून का पालन भी सख्ती से करते हैं। इसके चलते बोहरा समाज की एक अलग छवि दुनियाभर में है। इस सोच का सुखद परिणाम है कि बोहरा समाजजन धनतेरस पर बहीखाते पर बिस्मिल्लाह लिखते हैं।

मस्जिद, मुसाफिरखाने का निर्माण

दुनियाभर में समाज की मस्जिदें और मुसाफिरखाने हैं। बताया जाता है बोहरा समाज की विश्व में 700 से ज्यादा मस्जिदें हैं। 72 से ज्यादा योजनाएं और 26 अस्पताल संचालित किए जा रहे हैं।

हर व्यक्ति के पास स्मार्ट कार्ड

तकनीक के मामले में भी बोहरा समाज हाईटेक माना जाता है। भारत सरकार के आधार कार्ड बनाने से पहले बोहरा समाज ने समाजजन को स्मार्ट कार्ड दे दिया था। इसके जरिये समाज में उसकी अलग पहचान रहती है। समाज की वेबसाइट पर हर व्यक्ति का डाटा अपलोड है। यह डाटा उनके स्मार्ट कार्ड से लिंक है। स्मार्ट कार्ड पर अंकित आईडी और पासवर्ड के जरिए इस साइट पर लॉग इन किया जा सकता है। लॉग इन करते ही संबंधित व्यक्ति की पूरी प्रोफाइल सामने होती है।

इन जगहों पर प्रमुख बसाहट

देश के सूरत, अहमदाबाद, जामनगर, राजकोट, दाहोद, मुंबई, पुणे, नागपुर, चेन्नाई, उदयपुर, उज्जैन, इंदौर, शाजापुर, बुरहानपुर में बोहरा समाजजन बहुतायत में हैं। वहीं पाकिस्तान के सिंध प्रांत, ब्रिटेन, अमेरिका, दुबई, इराक, यमन व सऊदी अरब में भी बड़ी संख्या में समाजजन हैं। करीब 40 देशों में समाज के लोग निवास करते हैं।

सैयदना सर्वोच्च आध्यात्मिक पद

सैयदना बोहरा समाज में सर्वोच्च आध्यात्मिक पद होता है। समाज के तमाम ट्रस्टों पर उनका नियंत्रण होता है। इसमें मस्जिद, मुसाफिरखाने, दरगाह और कब्रिस्तान के सहित अन्य के नियंत्रण के लिए 150 से अधिक ट्रस्ट हैं।

200 साल पुरानी मस्जिद में आए आठ सैयदना

शहर की 200 साल पुरानी बोहरा बाखल स्थित मस्जिद में आठ सैयदना आ चुके हैं। इसमें अब तक 45वें, 46वें, 47वें, 48वें, 49वें, 51वें, 52वें और 53वें सैयदनाओं की वाअज हो चुकी है। इसके चलते यह मस्जिद समाज के लिए अहम है। हाल ही में इसका जीर्णोद्धार किया गया है।

फिजूलखर्ची पर रोक, सादगी से हो रही शादी

बोहरा समाज के 53वें धर्मगुरु सैयदना आलीकदर मुफद्दल मौला ने तीन साल पहले समाज में फिजूलखर्ची रोकने के लिए सादगी से शादी समारोह करने का फरमान जारी किया था, जिस पर शिद्दत से अमल हो रहा है। फरमान के मुताबिक मुख्य भोजन के अलावा शादी समारोह में सिर्फ एक मीठा और नमकीन बनाया जाए। अब मुख्य मैन्यू में एक सब्जी, दाल, रोटी, पापड़ और सलाद शामिल हैं। आतिशबाजी, महंगे कपड़ों सहित कई तरह की फिजूलखर्ची पर भी रोक लगाई गई है।

सबको मिले सेहतमंद खाना इसलिए टिफिन सेवा

फैज-उल-मवाइद-उल-बुरहानिया संस्था पांच साल से बोहरा समाज के घर-घर टिफिन सेवा दे रही है। बोहरा समाज का कोई बंदा भूखा न सोए, अमीर हो या गरीब सभी को सेहतमंद खाना मिले। इस मंशा से 52वें धर्मगुरु सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन साहब ने यह संस्था शुरू की थी। संस्था का मकसद समाज के घर-घर भोजन के टिफिन भेजना है।

खुद के बैंक से देते बिना ब्याज की राशि

बोहरा समाज कुरआन के सिद्धांत पर खुद का बैंक बनाकर समाज के जरूरतमंदों की मदद करता है। समाजजन को सूदखोरों और बैंक के ब्याज से बचाने के लिए बिना ब्याज के लोन दिया जाता है। इसके लिए कर्ज-ए-हसना फंड की स्थापना की गई है। इसके जरिए व्यापार, बेटी की शादी और पढ़ाई के लिए जरूरत के मुताबिक लोन दिया जाता है।

शिक्षा के लिए मदरसे और स्कूल

बोहरा समाज द्वारा शिक्षा के लिए मदरसे और स्कूल भी संचालित किए जाते हैं। एमएसबी एजुकेशन इंस्टीट्यूट में बड़ी संख्या में विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। दुनियाभर में 60 से अधिक पुस्तकालयों का संचालन भी किया जा रहा है। समाज की 95 फीसदी जनसंख्या शिक्षित है। इसमें महिला-पुरुषों का प्रतिशत बराबर है। सैयदना ने दीनी और दुनियावी तालीम दोनों को जरूरी बताया है।

जरूरतमंदों की मदद

समाज में आर्थिक असमानता दूर करने के लिए हैसीयतमंद को कुरआन के सिद्धांत का हवाला देते हुए मदद करने की बात कही गई है। इसमें आर्थिक रूप से सक्षम लोग जीवनस्तर ऊंचा उठाने के लिए जरूरतमंद को हरसंभव मदद करते हैं। गरीबों को रियायती कीमत पर मकान भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

रस्म-ए-सैफी की शुरुआत इंदौर से

52वें धर्मगुरु डॉ. सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन साहब धर्मगुरु बनने के बाद पहली बार 1971 में इंदौर आए थे। उन्होंने 101 जोड़ों की इज्तेमाई शादी कराकर रस्म-ए-सैफी की शुरुआत की थी। इसके बाद सामूहिक विवाह का सिलसिला शुरू हुआ।

सैफीनगर मस्जिद की नींव रखी

52वें धर्मगुरु जब 1986 में इंदौर आए तो वे खंडवा से मीटरगेज ट्रेन से सैफीनगर स्टेशन पहुंचे। इसी दिन इस स्टेशन का उद्घाटन हुआ था। लोग उनकी आमद के इंतजार में पटरियां चूमने लगे थे। इस मौके पर उन्होंने सैफीनगर मस्जिद की नींव रखी थी।

राजवाड़े के लिए दान दिया

52वें धर्मगुरु वाअज के लिए जब 2002 में आए तो उन्होंने राजवाड़े के जीर्णोद्धार के लिए 20 लाख रुपए दिए। साथ ही 651 जोड़ों का सामूहिक निकाह भी कराया जो उस समय एक रिकॉर्ड था। वे 12 दिन शहर में रुके थे।

क्या कहते हैं समाजजन

सैयदना की सीख से कामयाबी

सैयदना की सीख पर चलकर समाज ने कामयाबी हासिल की है। हार्डवेयर, लोहा, स्टील और फर्नीचर के क्षेत्र में समाज के कई लोग काम कर रहे हैं। अन्य क्षेत्रों में भी समाज का एक अलग स्थान है।- मोहम्मद पीठावाला, प्रदेशाध्यक्ष, स्टील यूसर फेडरेशन

ब्याज पर पैसा लेने की जरूरत नहीं

बोहरा समाजजन को करजना फंड से बिना ब्याज के पूंजी मिल जाती है। इसके बाद व्यापार करना आसान हो जाता है। आज हर क्षेत्र में समाज के लोगो की अलग पहचान है। - इकबाल चप्पू, कार्यकारिणी सदस्य, इल्वा

नेकनीयत पर विश्वास

बोहरा समाज को अन्य समाज के लोग भी सम्मान की नजर देखते हैं। उन पर विश्वास करते हैं। बोहरा समाज सभी के साथ मिलजुलकर रहता है। - जौहर मानपुरवाला, सदस्य, बोहरा व्यापारी एसोसिएशन

सम्मान की सीख

सैयदना की सीख है अन्य धर्मों का भी सम्मान करो। इसके चलते सद्भाव के साथ रहते हैं। हिंदुस्तान सहित पाकिस्तान, अरब, श्रीलंका, दुबई आदि में भी समाजजन की अलग पहचान है। -मजहर हुसैन सेठजीवाला, रियल स्टेट कारोबारी

सभी करते हैं अमल

समाज के सभी लोग सैयदना की सीख पर अमल करते हैं। उनकी हिदायतों पर चलकर जीने का सलीका आता है और खुशी हासिल होती है। वे अमन का पैगाम देते हैं। - बुरहानुद्दीन शकरूवाला, सदस्य, जनसंपर्क समिति

- 9 लाख देश-दुनिया में आबादी

- 85 फीसदी लोग व्यापारी

- 15 फीसदी नौकरीपेशा

- 95 फीसदी शिक्षित।

- 40 देशों में समाजजन।

उदारवादी सोचः महिला-पुरुषों को समान अधिकार

- शिक्षा और व्यापार हासिल करने और अपनी योग्यता के अनुसार व्यापार करने का हक महिला और पुरुष को समान रूप से हासिल है। औरतें चूल्हे-चौके में बंधकर न रह जाएं, इसलिए शुरू की टिफिन सेवा।

- बोहरा समाज के धर्मगुरु का कहना है कि जिस वतन में रहो, उसके प्रति वफादार रहो। वहां के कायदे-कानून का सख्ती से पालन करो। हर कौम के लोगों के साथ मिलजुलकर रहो।

- सैयदना लोगों को स्वच्छता के प्रति तब से जागरूक कर रहे हैं, जब देश में स्वच्छता अभियान की शुरुआत नहीं हुई थी।