इंदौर। परीक्षा परिणाम आते ही चारों ओर बच्चों की आत्महत्या की खबरें आना शुरू हो जाती हैं। सिर्फ हमारा सिस्टम है जो बौद्धिक क्षमता और सफलता को अंकों के पैमाने पर नापता है। यदि कोई बच्चा पढ़ाई में अच्छा नहीं है तो माना जाता है कि वह कुछ भी नहीं कर सकता।

हर बच्चे में कोई न कोई खासियत जरूर होती है, जिसे बढ़ावा दिया जाए तो वह अपने क्षेत्र में अद्वितीय काम कर सकता है। आज हम आपको कुछ ऐसे ही लोगों की कहानी बताने जा रहे हैं, जो शैक्षणिक स्तर पर सामाजिक पैमाने के अनुसार सफल नहीं थे, पर अपनी फील्ड में बेहतरीन करियर बनाकर उन्होंने जिंदगी में सफलता हासिल की।

पांचवीं फेल आर्टिस्ट का फीवर

शहर के आर्टिस्ट वाजिद खान जाने जाते हैं अपनी खास शैली की कला के लिए। वे कीलों, हथौड़ी और इसी तरह की चीजों से पेंटिंग बनाते हैं। इस कला को पेंटेंट भी करा चुके हैं। फिलहाल वे फीफा वर्ल्ड कप के लिए स्कल्प्चर और एक हॉलीवुड फिल्म के लिए पेंटिंग तैयार कर रहे हैं, जबकि वे पांचवीं फेल हैं। वाजिद कहते हैं कि पांचवीं में फेल होने पर मुझे स्कूल और घर दोनों से निकाल दिया गया था।

मैं अपने गांव सोनगरी से पैदल 12 किमी चलकर शहर आया। वहां से अहमदाबाद की ट्रेन पकड़ी। करीब 10-15 साल के संघर्ष के दौरान पुराने कपड़े और प्याज बेचने से लेकर स्पोर्ट्स और रोबोटिक्स तक का काम किया। अंतत: कला क्षेत्र में आया। मेरी पहली पेंटिंग ही 20 लाख में बिकी। यह तभी संभव हुआ, जब मैंने सफलता को अंकों या पैसों से नहीं, बल्कि क्रिएटिविटी और इनोवेशन से जोड़कर देखा।

इंडियाज गॉट टैलेंट की विजेता थी बैक बेंचर

इंडियाज गॉट टैलेंट जीत कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी शास्त्रीय नृत्यांगना रागिनी मक्खर बैक बेंचर थी। छठी में उन्हें सप्लीमेंटरी भी आई थी। रागिनी कहती हंै कि मैं बस दिन भर नाचती रहती थी। पढ़ाई में मन नहीं लगता था। जब सप्लीमेंटरी आई तो मम्मी-पापा ने खूब डांटा, कहा कि मैं परिवार की इज्जत खराब कर दूंगी।

तब मैंने मां के सामने दिल की बात रखी और कहा कि यदि आप मुझे नाचने देंगे तो मैं हर एग्जाम पास करके दिखाऊंगी। मुझे इजाजत मिल गई। नृत्य की विधिवत शिक्षा लेने के साथ ही मैंने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। आज मैं पीएचडी होल्डर हूं। मेरे माता-पिता ने मुझ पर विश्वास किया और अंतत: मैंने अपने आप को साबित कर दिखाया। सफलता अंकों पर नहीं, विश्वास पर निर्भर करती है, इसलिए बच्चों को खुद पर और परिवार को अपने बच्चों पर विश्वास रखना चाहिए।

पढ़ाई की ताकत भी खेल में दिखाई

दो बार ओलिंपिक खेलने वाले मध्य प्रदेश के इकलौते रेसलर पप्पू यादव पढ़ाई में बिलकुल भी अच्छे नहीं थे। ग्रेस और खेल के सर्टिफिकेट दिखाकर उन्होंने बीए पास किया। वे कहते हैं मेरा मन सिर्फ खेल के मैदान में लगता था इसलिए वहां खूब मेहनत की, साथ में पढ़ाई भी चलने दी। नेशनल टीम में सिलेक्ट होने के बाद 1992 में बार्सिलोना ओलिंपिक खेला। हालांकि असफलता हर क्षेत्र में मिलती है।

1994 में हिरोशिमा में हुए एशियाड में मैं उन खिलाड़ियों से हार गया, जिन्हें मैं दो-दो बार हरा चुका था। शुरुआत में बहुत निराशा हुई, पर हार नहीं मानी। 1994 में फिर ओलिंपिक खेलने अटलांटा गया और अपने आप को साबित करके दिखाया। आज भी बच्चों को यही सलाह देता हूं सफलता-असफलता दोनों जीवन का हिस्सा है, इनसे डरने या निराश होने की जरूरत नहीं है।

कमजोरी नहीं, ताकत पर ध्यान दें

हमारे बच्चों की आत्महत्या का दोषी हमारा एजुकेशन सिस्टम, स्कूल और पेरेंट्स ही हैं। हम बच्चों को उनकी ताकत के बजाय बार-बार उनकी कमजोरियों के बारे में बताते हैं, जिससे किसी भी क्षेत्र में उनकी योग्यता विकसित नहीं हो पाती। इंग्लैंड में यदि बच्चा गणित में फेल है और इतिहास में अच्छे नंबर लाता है तो रिपोर्ट कार्ड पर टीचर का कमेंट यह होता है कि बच्चा इतिहास में बहुत अच्छा कर सकता है, उसे इतिहास और ज्यादा पढ़ना चाहिए। ऑस्ट्रेलियन स्कूलों में एक विभाग होता है, जो बच्चे को उनकी स्ट्रेंथ पर फोकस करना सिखाता है। अकसर हम देखते हैं कि जो बच्चे टॉपर होते हैं, वे सिर्फ बड़े पैकेज पर नौकरी करते हैं, जबकि जो एवरेज स्टूडेंट होते हैं, वे आंट्रप्रन्योर बनकर समाज को कुछ नया दे पाते हैं। -डॉ. सुमेर सिंह, प्रिंसिपल डेली कॉलेज