अनुकृति श्रीवास्तव जबलपुर। घर की साफ-सफाई का समय हो या किचन के काम का। बिलहरी निवासी छाया सक्सेना के मन में यही चलता रहता है कि हिंदी का छंद बनाने में वाक्यों का चयन कैसे किया जाए, कितनी मात्राएं रखी जाएं। एक निजी इंजीनियरिंग कॉलेज में प्राध्यापक शोभित वर्मा भी समय मिलने पर बस यही सोचते हैं कि हिंदी में छंद रचना करके आचार्यजी को दिखाना है।

ये अकेले उदाहरण नहीं हैं बल्कि ऐसा हाल देशभर के हजारों भाषा प्रेमियों का है। इस तरह के लगाव को प्रोत्साहित करने, अधिक से अधिक लोगों को हिंदी से जोड़ने का बीड़ा 15 साल पहले शहर के इंजीनियर संजीव वर्मा 'सलिल" ने उठाया था। इसके लिए उन्होंने www. divyanarmada.in नामक वेबसाइट बनाई। आज इस वेबसाइट पर हिंदी भाषा सिखाने से संबंधित करीब 2 लाख पेज हैं। जिससे करीब 25 लाख फॉलोअर्स जुड़े हैं। अब तक करीब 500 लोग सलिल की ऑनलाइन कक्षा से हिंदीछंद रचना सीख चुके हैं। संजीव वर्मा 'सलिल" ने बताया कि स्कूलों में हिंदी की किताबों का पुस्तकालय खोलने के लिए भी वे विश्ववाणी हिंदी संस्थान के जरिए प्रयासरत हैं।

90 के दशक में सीखा कंप्यूटर

संजीव वर्मा के अनुसार वे हिंदी भाषा के प्रसार के लिए कुछ करना चाहते थे। वर्ष 95-96 में जब कंप्यूटर का चलन बढ़ा तो उन्होंने खासतौर पर इसे सीखा। आगे चलकर इंटरनेट माध्यम उनकी महत्वाकांक्षा को पूरा करने का सारथी बना। सोशल मीडिया ने तो हिंदी को पसंद करने वालों की कड़ी को एक-एक करके देश ही नहीं विदेशों तक जोड़ दिया। सरस्वती कुमारी सिंह-ईटानगर, श्यामल सिन्हा-गुड़गांव, अरुण शर्मा-भिवंडी, सुनीति सिंह-लखनऊ, विनोद जैन सागवाड़ा (राजस्थान) ऐसे ही कई नाम हैं जो -'दिव्य नर्मदा से ऑनलाइन जुड़े हैं।

ऑनलाइन लगती है क्लास

प्राध्यापक शोभित ने बताया कि वे आचार्यजी पहले हिंदी छंद की जानकारी देते हैं फिर लिखने का तरीका बताते हैं। सिर्फ हिंदी छंद ही नहीं हिंदी की अशुद्धियों को भी निरंतर दूर करते हैं।