अभिलाषा सक्सेना, इंदौर। देश में हिंदी प्रेमी तो कई मिल जाएंगे, लेकिन हिंदी प्रेम के चलते तीन साल के डिप्लोमा इंजीनियरिंग कोर्स को पांच साल में करने और उसके बाद नौकरी में भी सिर्फ हिंदी का प्रयोग करने वाले लोग शायद ही हों। हम बात कर रहे हैं 74 साल के हिंदी भक्त लक्ष्मीचंद जैन की। जिन्होंने ऐसे समय में जब इंजीनियरिंग करना सिर्फ अंग्रेजी में ही संभव था, हिंदी में परीक्षा उत्तीर्ण करके दिखाई।

इसके लिए उन्हें काफी संघर्ष जरूर करना पड़ा, लेकिन कहते हैं न जब आपके मन में सच्ची श्रद्धा हो, समर्पण हो तो रास्ते में आने वाली मुश्किलें कोई मायने नहीं रख्ातीं। हिंदी दिवस के मौके पर नईदुनिया ने उनसे बात करके उनके सफर के बारे में जानने का प्रयास किया।

मूलत: झाबुआ के रहने वाले जैन बताते हैं उन्होंने 1965 में अहमदाबाद तकनीकी बोर्ड के राजकीय पॉलिटेक्निक महाविद्यालय दाहोद में दाखिला लिया। दो साल में परीक्षा पास कर ली। 1968 में दाहोद में एक आम सभा हो रही थी, जिसमें कई केंद्रीय नेता शामिल हुए थे और हिंदी भाषा को महत्व देने के लिए हिंदी में ही कामकाज की शपथ ले रहे थे। मैंने भी शपथ ली और यहीं से मेरा संघर्ष शुरू हो गया। अंग्रेजी से अनुवाद करके परीक्षा में सारे उत्तर हिंदी में लिखे, लेकिन परीक्षा जांचने वालों को हिंदी नहीं आती थी और मुझे अनुत्तीर्ण कर दिया गया।

1969 में फिर अनुत्तीर्ण हुआ। पिताजी ने दबाव बनाया कि वापस आ जाओ, तुम्हारी फालतू की जिद के चलते पैसा खराब हो रहा है। लेकिन मैंने ठान लिया था कि परीक्षा तो हिंदी में ही पास करूंगा, चाहे जो हो जाए। स्वाध्यायी छात्र के रूप में फिर बैठा और 1970 में मुझे सफलता मिली।

गृह निर्माण मंडल में सहायक यंत्री के रूप में काम करते हुए जैन ने सारा तकनीकी काम हिंदी में ही किया। 33 साल की सेवा में उन्होंने कभी अंग्रेजी में काम नहीं किया। अपने साथियों को भी हिंदी में काम करने के लिए प्रेरित करते रहे। कई बार लोगों ने उनका मजाक भी बनाया कि अंग्रेजी नहीं आती इसलिए हिंदी में काम करते हैं, लेकिन जैन कभी इन बातों से डगमगाए नहीं।

जैन को उनके हिंदी भाषा के प्रति प्रेम और निष्ठा के लिए कई सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। हालांकि केंद्र सरकार से उन्हें जिस तरह से सम्मान प्राप्त होना चाहिए था वो नहीं मिला। जैन कहते हैं उन्होंने हमेशा हिंदी को उच्च स्थान दिलाने के लिए प्रयास किया, लेकिन वो आहत हैं कि इतने सालों बाद भी राजभाषा होने के बावजूद हिंदी को वो स्थान नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिए था। उच्च शिक्षा और नौकरियों में आज भी अंग्रेजी का ही दबदबा है। जैन कहते हैं हिंदी को सम्मान दिलाने के लिए युवाओं को आगे आना होगा और तकनीकी, यांत्रिकी, चिकित्सकीय और राज्य और संघ स्तरीय परीक्षाएं हिंदी में ही देनी चाहिए।