प्रशांत गुप्ता, रायपुर। डॉ. भीमराव आंबेडकर अस्पताल के नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. पुनीत गुप्ता और उनकी टीम ने मेडिकल साइंस में एक बड़ा प्रयोग किया है। इससे किडनी मरीजों के डायलिसिस का खर्च बचेगा। इस खोज का नाम है 'मेक-डी', जो जैकेटनुमा डायलिसिस किट है।

साल 2015 में यह मशीन बनाई गई, इसके बाद दुर्ग अंजोरा के वेटनरी कॉलेज में इसका पशुओं पर ट्रायल हुआ, जो सफल रहा। जांच के लिए इसे बेंगलुरू स्थित गुड प्रैक्टिसिंग लैब (जीपीएल) भेजा गया, जहां लैब में जांच कर ये देखा गया कि यह ह्यूमन ट्रायल के लिए उपयुक्त है या नहीं।

रिपोर्ट पॉजीटिव थी, उपयुक्त पाई गई। डॉ. गुप्ता ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर अनुमति मांगी है। ह्यूमन ट्रायल से यह स्पष्ट होगा कि यह मेक-डी मरीज के संपर्क में आने के बाद मरीज के अन्य किसी अंग में साइड इफेक्ट तो नहीं हो रहा है। इस मशीन का अमेरिका में प्रजेटेंशन हो चुका है। डॉ. गुप्ता इसे पेटेंट करवाने के लिए भी आवेदन दे चुके हैं।

35 हजार रुपए लागत

जानकारी के मुताबिक इस जैकेट को बनाने में लागत करीब 35 हजार रुपए आई है, जो अस्पताल में पांच बार डायलिसिस के खर्च के बराबर है।

अभी होता है 15-20 हजार खर्च

किडनी मरीजों के लिए यह जैकेट वरदान साबित हो सकती है, क्योंकि इससे इलाज का खर्च काफी कम हो जाएगा। अभी एक डायलिसिस का खर्च ही 5-7 हजार है, तो महीने में तीन डायलिसिस यानी 15-20 हजार रुपये। इस मशीन से 70 फीसद राशि बचेगी।

मरीज इसे आसानी से खुद ही ऑपरेट कर सकता है। ऐसे सेंसर लगे हुए हैं जो प्रक्रिया पूरी होने पर सिग्नल देते हैं। अगर यह मशीन बाजार में आती है तो सरकारी अस्पतालों में डायलिसिस के लिए लगने वाली कतार कम हो जाएगी।

जानिए क्या है मेक डी

मार्च 2015 में बनाई गई मैक-डी डायलिसिस मशीन की खास बात यह है कि इस जैकेटनुमा मशीन को पहनकर खुद ही डायलिसिस कर सकते हैं। 'मेक-डी' का वजन 10 किलोग्राम से कम है। इसमें लगे जीपीएस सिस्टम के जरिए मरीज द्वारा डायलिसिस किए जाने से संबंधित हर एक जानकारी डॉक्टर्स के पास होगी। इसके लिए मरीज को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसे पहनकर मरीज घर, बाहर आ-जा सकता है, उसे कोई परेशानी नहीं होगी।

कुत्तों पर हो चुका है सफल प्रयोग

मेक-डी का इससे पहले डॉक्टरों ने कुत्तों पर प्रयोग किया था, जो सफल रहा। उस दौरान 8 कुत्तों पर इसका प्रयोग करके देखा गया था। प्रयोग में सामने आया था कि कुत्तों में 23 फीसदी से लेकर 33 फीसदी तक की रिकवरी किडनी फंक्शन में हुई थी।