अहद खान, झाबुआ। स्वाधीनता आंदोलन में झाबुआ जैसे आदिवासी इलाके में राजशाही के खिलाफ उठी आवाज और इसके साथ ही अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे आंदोलन को 1931 में हुए कांग्रेस के कराची अधिवेशन में स्वतंत्रता संग्राम का दर्जा मिला था। ये दर्जा तब खुद कांग्रेस के अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दिया था। झाबुआ से पहुंचे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने कराची पहुंचकर पंडित नेहरू को यहां चल रहे आंदोलन की जानकारी दी थी। तब नेहरू ने कहा था- झाबुआ में राजशाही के विरुद्ध चल रहा आंदोलन राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा है। संपूर्ण देश इसका समर्थन करे।

झाबुआ के इतिहासकार डॉ. केके त्रिवेदी कहते हैं, स्वतंत्रता आंदोलन में आदिवासी अंचल की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है। इसकी शुरुआत जरूर राजशाही के रवैये से तंग आकर की गई, लेकिन विस्तार होता चला गया। शुरुआत 1920 में हुई। तब व्यापारी मंडल पर करों (टैक्स) की अधिकता के कारण उसके विरोध के लिए प्रजामंडल का गठन किया गया। इसके अध्यक्ष रानापुर के वरदीचंद जैन थे। इसमें 13 सदस्य थे। लट्ठा टैक्स सहित कई दूसरे करों का विरोध शुरू किया गया। यही आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बना। थांदला के कन्हैयालाल वैद्य एक नामी पत्रकार थे।

वे 30 से अधिक समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लिखते थे। झाबुआ की बात देश के अन्य हिस्सों तक पहुंचाने का श्रेय उन्हीं को जाता है। उन्होंने लिखा था, राजशाही आज जनता के हित में काम नहीं कर रही। अकाल में भी जनता की मदद नहीं की जाती। उनके अलावा थांदला के कुसुमकांत जैन, मामा बालेश्वर दयाल, रघुनंदन शरण शर्मा बड़े नाम थे। मामा बालेश्वर दयाल को पहचान की जरूरत नहीं है। रघुनंदन शरण शर्मा पहले पुलिस प्रोसिक्यूटर थे, लेकिन राजा की नौकरी छोड़ आंदोलन में कूद पड़े थे। भारत छोड़ो आंदोलन के समय आदिवासियों में भी ज्वाला उठ रही थी।

हटेसिंह नाम के आदिवासी का बड़ा नाम था। उनके पीछे सैकड़ों लोग आकर प्रदर्शन करते थे। लोगों ने उनका नाम राजा हटेसिंह रख दिया था। इस दौरान स्वदेशी और शराबबंदी के लिए आंदोलन चले। हटेसिंह लोगों से कहते थे, हम विदेशी नहीं, अपना ही बनाया कपड़ा पहने। चाहे वो मोटा क्यों न हो। शराबबंदी के किस्से भी दिलचस्प है। इधर, सेनानी शराब छोड़ने की समझाइश देते तो राजशाही के लोग शराब भिजवाने का काम करते। थांदला के पास हरिनगर में शराब भेजी गई तो शांतिलाल शर्मा पहुंच गए। उन्होंने मजमा बिखेर दिया। फिर उन्हें धमकियां भी झेलनी पड़ी।