नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में नवगठित पांच सदस्यीय संविधान पीठ समलैंगिक यौन संबंधों के मुद्दे सहित चार अहम मामलों पर 10 जुलाई मंगलवार को सुनवाई शुरू कर दी है। इससे पहले सुनवाई को चार हफ्ते टालने की केंद्र सरकार की याचिका को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा ने खारिज कर दिया था।

धारा 377 को दी गई चुनौती के अलावा संविधान पीठ केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध से जुड़े विवादित मुद्दे की भी सुनवाई करेगी। पीठ भारतीय दंड संहिता की धारा 497 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली अर्जी पर भी सुनवाई करेगी। इस धारा के तहत व्यभिचार के लिए सिर्फ पुरुषों को दंडित किया जाता है और अपराध में शामिल महिलाओं को पीड़िता माना जाता है।

संविधान पीठ उस याचिका पर भी सुनवाई करेगी, जिसमें यह फैसला करना है कि किसी सांसद या विधायक के खिलाफ किसी आपराधिक मामले में आरोप-पत्र दायर करने के बाद उन्हें अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए या दोषी करार दिए जाने के बाद ही अयोग्य करार दिया जाना चाहिए।

समलैंगिकता पर यह है मामला

उच्चतम न्यायालय ने 2013 में समलैंगिकों के बीच यौन संबंधों को अपराध घोषित कर दिया था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2009 में अपने एक फैसले में कहा था कि आपसी सहमति से समलैंगिकों के बीच बने यौन संबंध अपराध की श्रेणी में नहीं होंगे।

मगर, उच्चतम न्यायालय ने इस फैसले को दरकिनार करते हुए समलैंगिक यौन संबंधों को आईपीसी की धारा 377 के तहत अवैध घोषित कर दिया था। उच्चतम न्यायालय के इस फैसले के बाद पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं और जब उन्हें भी खारिज कर दिया गया तो प्रभावित पक्षों ने सुधारात्मक याचिका (क्यूरेटिव पिटीशन) दायर की ताकि मूल फैसले का फिर से परीक्षण हो।

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समलैंगिगता को अपराध मानने वाली IPC धारा 377 को अंसवैधानिक करार देने की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संविधान पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंग्टन आर नरीमन, जस्टिस ए एम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड और जस्टिस इंदू मल्होत्रा का संविधान पीठ शामिल हैं, जो ममले की सुनवाई करेंगे।

एक याचिका हमसफर ट्रस्ट की ओर से अशोक राव कवि ने दायर की है। वहीं, दूसरी याचिका आरिफ जफर ने दायर की है। याचिका में कहा गया है कि धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला दोषपूर्ण है। याचिका में कहा गया है कि निजता के अधिकार के फैसले में सुप्रीम कोर्ट के धारा 377 के फैसले को उलट दिया गया है। याचिका में हाल के हदिया मामले पर दिए गए फैसले का जिक्र किया गया है जिसमें शादीशुदा या गैर शादीशुदा लोगों को अपना पार्टनर चुनने का अधिकार दिया गया है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 में कहा गया है कि जो भी अनैतिक शारीरिक संबंध बनाता है, उसे आजीवन कारावास या 10 साल का कारावास और जुर्माना की सजा दी जाएगी। हालांकि, इस धारा के तहत मुकदमे दुर्लभ ही रहे हैं। मगर, यह कहा जाता है कि एलजीबीटी समुदाय के सदस्यों को परेशान करने और डराने के लिए पुलिस इस कानून का इस्तेमाल करती है।

विधायकों और सांसदों की वकालत रोकने को लगाई याचिका