अश्विन बक्शी, इंदौर। प्रदेश सरकार सालों से जनसंख्या नियंत्रण के लिए कार्यक्रम चला रही है, फिर भी प्रदेश के 51 में से 25 जिलों में टोटल फर्टिलिटी रेट (टीएफआर) 3 से कम नहीं हो पा रहा है। यानी यहां औसतन हर महिला तीन से अधिक बच्चों को जन्म दे रही है। जबकि, शासन ने इन जिलों में 'मिशन परिवार विकास" चलाकर अतिरिक्त बजट भी उपलब्ध कराया है।

इंदौर संभाग में खंडवा, खरगोन व बड़वानी में टीएफआर 3 से अधिक है। वहीं इंदौर जिले में यह रेट 2.2 तक गिर गया है। उक्त जिलों में परिवार नियोजन कार्यक्रम पूरी तरह प्रभावी नहीं होने से मप्र का टोटल फर्टिलिटी रेट 3.2 के आसपास बना हुआ है। इसे 2.1 होना चाहिए। वहीं राष्ट्रीय स्तर पर यह रेट 2.6 तक है।

मिशन परिवार विकास के तहत केंद्र सरकार ने 2017 में पूरे देश से 146 ऐसे जिलों का चयन किया है जिनमें टीएफआर 3 से अधिक है। सरकार ने इन सभी जिलों के लिए विशेष पैकेज देकर महिला-पुरुषों को परिवार नियोजन अपनाने के लिए पहल की। हितग्राहियों को एक निश्चित राशि भी दी।

इसके बावजूद इसका व्यापक असर नहीं दिखाई दे रहा। 19 राज्य यह आंकड़ा 2.1 पर ला चुके हैं। इसीलिए सबसे अधिक प्रजनन दर वाले सात राज्य उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़, असम व मध्यप्रदेश के इन 146 अधिक रेट वाले जिलों को चुना गया।

यह है टोटल फर्टिलिटी रेट

18 से 49 साल तक की महिलाएं अपने जीवन में कितने बच्चों को जन्म देती हैं, इसी का आकलन टोटल फर्टिलिटी रेट में लगाया जाता है। टीएफआर 3 का मतलब है एक महिला अपने जीवन में तीन बच्चों को जन्म दे रही है। सरकार की मंशा यह है कि एक महिला सिर्फ दो बच्चों को ही जन्म दे, तभी जनसंख्या को नियंत्रित किया जा सकता है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, 1951 में राष्ट्रीय टीएफआर करीब 7 था। तबसे परिवार नियोजन कार्यक्रम चलाकर इसे कम करने का प्रयास किया जा रहा है।

इस तरह किए जा रहे प्रयास

- परिवार नियोजन कार्यक्रम के लिए हर जिले को लगभग छह लाख रुपए तक राशि दी जाती है।

- परिवार नियोजन के साधन व गोलियां अस्पतालों को निशुल्क उपलब्ध करवाए जाते हैं।

- हर जिले में महिला नसबंदी पर 1400 रुपए व पुरुष नसबंदी पर 2000 रुपए दिए जा रहे।

- अधिक टीएफआर वाले जिलों में विशेष पैकेज दिया गया है। महिला नसबंदी पर 2000 व पुरुष नसबंदी पर 3000 रुपए तक दिए जा रहे हैं।

चार हजार डॉक्टरों की कमी

मिशन परिवार कल्याण के लिए पूरे प्रदेश में आठ हजार प्रशिक्षित डॉक्टरों की आवश्यकता है, लेकिन सिर्फ करीब चार हजार डॉक्टरों को ही इसकी ट्रेनिंग मिली है। इसलिए हर अस्पताल में नसबंदी नहीं हो पाती। डॉक्टरों की कमी भी एक कारण बनकर सामने आया है।

अभी भी जागरुकता की कमी

जिन जिलों में टोटल फर्टिलिटी रेट 2.1 से अधिक है वहां जागरुकता की सबसे अधिक कमी सामने आई है। शहरी क्षेत्र की तुलना में ग्रामीण क्षेत्र में लोग परिवार नियोजन अपनाने में पीछे हैं। वहीं पारिवारिक कारण व लगातार बेटियां होने पर बेटे की चाह भी इसका बड़ा कारण है। एक, दो या तीन लड़कियों के होने के बाद भी बेटा हो इसलिए भी परिवार नियोजन को कम अपनाया जा रहा है। वहीं लोग ऑपरेशन से डरते हैं।

यहां भी टीएफआर 3 से अधिक

पन्ना - 4.3

शिवपुरी - 4.4

विदिशा - 4.0

छतरपुर - 4.1

सतना - 3.7

दमोह - 3.6

सीहोर - 3.6

डिंडोरी - 3.5

गुना - 3.5

रायसेन - 3.6

रीवा - 3.4

सीधी - 3.4

उमरिया - 3.6

सागर - 3.5

कटनी - 3.3

शाजापुर -3.2

टीकमगढ़ - 3.3

नरसिंहपुर - 3.2

राजगढ़ - 3.2

रतलाम - 3.2

मुरैना - 3.2

खंडवा - 3.2

खरगोन - 3.1

झाबुआ - 3.0

हरदा - 3.0

प्रयासों से ही मिलेगी सफलता

अभियान चलाकर लोगों को प्रेरित किया जा रहा है। लोगों में जागरुकता आई है। हर चीज धीरे-धीरे ही सफल होती है। 2025 तक टीएफआर 2.1 तक लाया जा सकेगा।

- डॉ. ललित मोहन पंत, सलाहकार, भारत सरकार