- जे. कृष्णमूर्ति

जब तक हमारे पास सिर्फ शब्द हैं, उनका अर्थ नहीं तब तक हमारे पास जानकारी ही है, ज्ञान नहीं। हमारी तलाश अर्थ की तलाश होना चाहिए। वह किसी से मिलती नहीं है बल्कि खुद खोजना पड़ती है।

हम सोचते हैं कि परिभाषा को समझ लेने पर हम उस शब्द को समझ जाएंगे जिसे परिभाषित किया गया है। लेकिन परिभाषा समझ नहीं होती, बल्कि इसके विपरीत यह तो सोचने का सर्वाधिक विनाशक तरीका है।

हम सुंदर विश्व की परिभाषा इसलिए जानना चाहते हैं ताकि हमें इस बारे में चिंतन-मनन न करना पड़े, दिमाग का इस्तेमालन करना पड़े, सब पका-पकाया कोई हमे समझा दे।

आप इस संबंध में किताबें उलट-पलटकर या दार्शनिकों-विचारकों के पास जाकर सुंदर विश्व का अर्थ जान लेना चाहते हैं, इससे आपको शब्दों के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा।

हकीकत यह है कि उस प्रत्येक व्यक्ति को जिसे कि 'सुंदर विश्व' की परिभाषा यथार्थ में जाननी-समझनी है, उसे गहराई से इसका चिंतन-मनन करना होगा और उस शब्द के पीछे का सत्य भी जानना होगा।

यह अनुभूति से आएगा, किसी के कहने से। कोई कह देगा, आप सुनलेंगे लेकिन समझ नहीं पाएंगे। हृदय से उसे महसूस नहीं कर पाएंगे। अब जरा तथ्य देखिए। हमारी दुनिया एक सड़ीगली दुनिया है, यहां युद्ध हैं, धार्मिक, जातिवादी,आर्थिक, मानसिक सब तरह के विभाजन हैं।

यह एक भ्रष्ट और विकृत संसार है। शब्दों में बह जाना ठीक नहीं। हमें बचपन से ही हमेशा यह सिखाया जाता है कि क्या सोचें, यह हमें कभी नहीं सिखाया जाता कि कैसे सोचें। 'सिमेंटिक्स' नामक विज्ञान में शब्दों के तात्पर्य का अध्ययन किया जाता है।

जो भी शब्द वर्तमान में प्रचलित हैं या नए शब्द अस्तित्व में आ रहे हैं उनके विकास के मूल में एक संपूर्ण विज्ञान है। चूंकि शब्द हमें मानसिक और साथ ही भौतिक रूप से भी प्रभावित करते हैं, अत: यह महत्वपूर्ण है कि हम उन्हें समझें पर उनसे अभिभाजित रहें।

जिस क्षण साम्यवाद शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, यदि कोई पूंजीवादी सरोकार वाला व्यक्ति उसे सुन ले तो उसे कंप कंपी छूटने लगती है। किसी गुरु के अनुयायी को आप यह समझाएं कि 'दूसरे के अनुयायी मत बनो, अनुयायी बनना नासमझी है' तो वह तुरंत तनकर खड़ा हो जाएगा और आपको भागने पर मजबूर कर देगा।

शब्दों से होने वाला यह निरंतर भय समझ के अभाव के कारण होता है। कोई रास्ता आपने चुन लिया लेकिन यह पता नहीं है कि क्यों चुना है तो ऐसा होता है। जब तक हमारे पास शब्द हैं, हमें जानकारी है लेकिन जब हमें उन शब्दों का अर्थ पता है तो हमारे पास ज्ञान भी है।

आखिर शिक्षा का यही तो अर्थ है: शब्दों के माध्यम से दिए जाने वाले संप्रेषण को समझना, न कि शब्दों में उलझकर रह जाना। सुंदर विश्व जैसी कोई चीज नहीं होती। चीजें जैसी हैं, हम उन्हें वैसा ही स्वीकारें, न कि किसी आदर्श की तरह। सभी आदर्श बेतुके और हास्यास्पद होते हैं... भ्रामक होते हैं।

तथ्यत: वास्तविक वही है जो है। यदि सही मायने में हम विभिन्न चीजों को: गरीबी, भुखमरी, अलगाव,कटुता, आकांक्षा, लोभ, भ्रष्टाचार, भय आदि को जैसे वे हैं वैसा का वैसा ही उन्हें यथारूप समझ लें तो हम सब इनसे निपट सकते हैं, इन्हें मिटा सकते हैं।

किंतु यदि हम आदर्श बनाते हैं, हम कहते हैं कि मुझे यह अथवा वह होना चाहिए तो हम भ्रांतियों में भटकने लगते हैं। हमारे देश में सदियों से निरंतर जिन आदर्शोंकी घुट्टी पिलाई जाती रही है वे सभी भ्रम हैं।

यदि आप 'जो हैं' की समझ रखते हैं तो ही किसी वास्तविक क्रांति की संभावना बनती है।