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    स्वामी विवेकानंद ने भाइयों और बहनों कह कर जीत ली थी दुनिया

    Published: Mon, 11 Sep 2017 11:49 AM (IST) | Updated: Fri, 12 Jan 2018 08:35 AM (IST)
    By: Editorial Team
    swami vivekananda 11 09 2017

    मल्टीमीडिया डेस्क। स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागो में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में पूरी दुनिया का दिल जीत लिया था। विवेकानंद ने कहा था- हे अमेरिकावासी बहनों और भाइयों, आपने जिस सौहार्द और स्नेहपूर्णता के साथ हम लोगों का स्वागत किया है, उससे मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है। इस एक बात ने अमेरिका सहित पूरे विश्व का दिल जीत लिया था।

    124 साल पहले 30 साल की उम्र में विवेकानंद ने लोगों को कर्म का ज्ञान दिया था। उन्होंने कहा था कि मंदिर में बैठे रहने से भगवान नहीं मिलेगा, लोगों की सेवा करने से पुण्य मिलेगा। जहां विदेशों में वह भारत और भारत की संस्कृति का गुणगान करते थे, वहीं देश में आने पर धर्म में आ चुकी रूढ़ियों पर कुठाराघात भी करते थे।

    1893 को दिए भाषण के 124 साल पूरे होने के मौके पर जानते हैं कि उन्होंने क्या कहा था-

    विवेकानंद ने कहा था कि मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के परेशान और सताए गए लोगों को शरण दी है।

    उन्होंने इजरायल के लोगों का जिक्र करते हुए कहा था कि हमने अपने हृदय में उन इजरायलियों की पवित्र यादें संजोकर रखी हैं। रोमनों ने जब इजरायलियों का पवित्र मंदिर धूल में मिला दिया था, तह उन्होंने दक्षिण भारत में उसी वर्ष शरण ली थी।

    मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है।

    अंत में सब ईश्वर में मिल जाते हैं

    विवेकानंद ने कहा था कि जिस तरह अलग-अलग स्त्रोतों से निकली विभिन्न नदियां अंत में समुद में जाकर मिलती हैं, उसी प्रकार हे प्रभो। भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जाने वाले लोग अंत में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं। यह सम्मेलन जो आज तक आयोजित की गई सबसे पवित्र सभाओं में से है, गीता में बताए गए इस सिद्धांत का प्रमाण है।

    अायोजन के लिए शहरों में हुई थी वोटिंग

    बताते चलें कि साल 1893 का विश्व धर्म सम्मेलन कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज करने के 400 साल पूरे होने पर आयोजित किए गए विशाल विश्व मेले का एक हिस्सा था। अमेरिकी नगरों में इस आयोजन को लेकर इतनी उत्सुकता थी कि अमेरिकी सीनेट में न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन, सेंट लुई तथा शिकागो के बीच मतदान कराना पड़ा था, जिसमें शिकागो को बहुमत मिला।

    जमशेदजी टाटा थे उसके सहयात्री

    इस आयोजन में 2.75 करोड़ लोग शामिल होने आए थे। रोजाना डेढ़ लाख से ज्यादा लोग वहां आते थे और पूरा आयोजन देखने के लिए 150 मील चलना पड़ता था। विवेकानंद 31 मई 1893 को मुंबई से यात्रा प्रारंभ करके याकोहामा से एम्प्रेस ऑफ इंडिया नामक जहाज से वेंकुअर पहुंचे थे, जहां से ट्रेन के जरिये वह शिकागो पहुंचे थे। जहाज में उनके साथ युवक जमशेदजी टाटा भी थे, जो बाद में बड़े उद्योगपति बने।

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